विकास पुरुष का यह कैसा दर्प?

शैलेश कुमार

ले से पीछा छुड़ाने में लगी है। पर सच बात तो यह है कि फसलों की पैदावार अच्छी मात्रा में हुई है। कुछ दिनों पूर्व कर्नाटक में कृषि विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति प्रो बिस्लैया ने भी एक समारोह में यही बात कही। सच्चाई यह है कि देश में अनाज का बहुत बड़ा घोटाला चल रहा है, जिसका पर्दाफाश किये बिना मूल्य वृद्धि को नियंत्रित नहीं किया जा सकता।
मारीशस, थाईलैंड व श्रीलंका आदि देशों में भेजा जा रहा है। यहाँ यही चावल १२० से १४० रूपये प्रति किलो के हिसाब से बेचा जा रहा है। चावल की इस कालाबाजारी से अपराधियों को बड़ा फ़ायदा मिल रहा है। लेकिन इसका खामियाजा भारत की आम जनता भुगत रही है जिसे दुगुने मूल्य में चावल खरीदने को मजबूर होना पड़ा है। इस दशा में उच्च वर्ग और निम्न वर्ग के लोगों का काम चल जा रहा है। उच्च वर्ग के लोगों के पास इतना पैसा है कि वे बढ़ी हुई कीमतों में भी चावल खरीद लें। अति निम्न वर्ग के लोग भीख मांग के भी काम चला लेते हैं। लेकिन माध्यम वर्ग का क्या जो किसी के सामने हाथ फैलाने में भी हिचकिचाता है?
दिख रहा है। ऐसे में आम आदमी करे तो क्या करे? जिस सरकार को उसने चुनकर देश के माई-बाप के पद पर बैठाया है, वही उनका दुश्मन बन गयी है। सत्ता बचाने के लालच और अपना उल्लू सीधा करने की जुगाड़ में जन प्रतिनिधि कानो में रुई डालकर तथा आँखों पर पट्टी बांधकर बैठे हैं।
न में यही सवाल आता है कि क्या ये प्रजातंत्र केवल उनके लिए है जो आर्थिक रूप से समृद्ध हैं?
मला भी कर सकते हैं। पर अगले ही पल टीवी पर प्रसारित होते दृश्यों को देखकर तथा यह सोचकर कि देश में देशद्रोहियों की कमी नहीं है, मुझे यकीन हो गया कि इस बार हमला भारत को तोड़ने के उद्देश्य से किया गया है। उसे यह बताने के लिए किया गया है कि तुम्हारी अरबों की जनसंख्या की ज़िंदगी को नरक बनाने के लिए हम कुछ हज़ार आतंकवादी ही काफी हैं। मुझे विश्वास हो गया कि यह हमला इसलिए किया गया है कि हमारी सुरक्षा एजेंसियों को बताया जा सके कि वे कितने सचेत हैं और अपने दायित्वों का निर्वाह कितनी गंभीरता से कर रहे हैं। समझ गया मैं कि यह हमला केवल सैकड़ों लोगों का खून बहाने के लिए नहीं किया गया था, बल्कि इसका मकसद उन करोड़ों लोगों के अभिमान को तोडना था कि केवल "सारे जहाँ से अच्छा, हिंदुस्तान हमारा" गाकर और देश की विशालता की शेखी बघार कर वे अपने मुल्क को सभी विध्वंशकारी ताकतों से सुरक्षित रख पाएंगे।
त गयी। लेकिन दिलों में घर कर गयी अपनों को खोने की वह कसक कैसे जाएगी सो कुछ गिने-चुने आतंकवादी उस २६ नवम्बर की रात को दे गए? उस परिवार का क्या जिसके घर में कमाने वाला एक सदस्य भी जीवित न रहा? उन बच्चों का जिन्होंने होश सँभालने से पहले ही अपने माँ या बाप या फिर दोनों को खो दिया? मोमबत्तियां तो अब मुंबई हमले की हर बरसी पर जलेंगी। अख़बारों के लेख, नेताओं के भाषण में मरने वालों का जिक्र हर २६ नवम्बर को किया जायेगा। लेकिन उन सैकड़ों परिवारों के लिए २००८ का वह २६ नवम्बर फिर से आ पायेगा क्या, जिस २६ नवम्बर की सुबह उनके अपने उन्हें यह भरोसा देकर घर से निकले थे कि ढलती शाम के साथ वे एक बार फिर मिलेंगे? खैर वो २६ नवम्बर तो फिर से आने को रहा, पर अब वर्ष के हर दिन को वो २६ नवम्बर बनने से रोका जा सकता है, जो सबके लिए तो नहीं, लेकिन बहुतों के लिए प्रलय बनकर आया। लेकिन ऐसा सरकार के चाहने से नहीं, हमारे चाहने से होगा क्योंकि तो कभी ऐसा चाहेगी ही नहीं।
सा राक्षस बन चूका है जो इंसानों को खाता है, उनका खून बहाकर ठहाका मारकर हँसता है और उसका वश चले तो उसे भी मार खाए जो उसे खाने को देता है। वास्तव में फंसी की नौबत तो आनी ही नहीं चाहिए थी। याद रहे राक्षसों की हत्या नहीं की जाती, उनका तो वध किया जाता है। जैसे राम ने रावण का वध किया था। वैसे ही कसाब का भी वध किया जाना जरुरी था।
हैं। फिर कसाब के मामले में चुप्पी क्यों? क्यों शांत बैठे हैं हम? मत करो हिंसा, अहिंसात्मक तरीकों से सरकार पर दबाव बनायें। जरुरत पड़े तो कुछ भी करें क्योंकि आज की सरकार थोड़ी बहरी है। उसे ऊँचा सुनने की आदत है। उनके लिए धमाके की जरुरत है।


, नहीं तो खड़े-खड़े ही मंजिल तक जाना है. बस बदलनी पड़ी तो दौड़ कर दूसरे बस में भी चढ़ना है. भोजन का कोई समय और ठिकाना मालूम नहीं. जहाँ मिले फुर्सत के कुछ क्षण वहीं कर ली पेट पूजा. और चल पड़े अगली मंजिल की ओर.
जाऊंगा. खुद को दी गई यही तसल्ली बहुत ताकत देती है. मोबाइल पर दोस्तों से एसएम्एस करते और बाहर के दृश्यों को निहारते वक़्त कट जाता है. देर रात घर पहुंचकर एक ख़ुशी होती है कि दिन अच्छा रहा, काम अच्छा हुआ.
कुछ आसान बन जाता है.
है, मुझे ख़ुशी है उनकी, पर ये बहुत छोटी सी सफलता है, जिसे वृहद् रूप देना है. रास्ते कभी आसान नहीं होते, पर दिल को तसल्ली देकर और खुद पर विश्वास करके सब कुछ हासिल किया जा सकता है.
से मुझे बहुत कुछ सीखने को मिला है. साथ ही मैं उन लोगों का भी धन्यवाद करता हूँ जिन्होंने मेरा पैर खीचने की कोशिश की है. उन्होंने मुझे जितना पीछे खीचा है, उतना ही दम लगाकर मैंने आगे बढ़ने की कोशिश की है.
आ भी वही, जिसकी आशंका व्यक्त की जा रही थी. पहले तेलंगाना के समर्थन में हंगामा मचा था, अब विरोध में मचा. और जब फिर से गृह मंत्री का बयान आया कि फ़िलहाल कोई नया राज्य नहीं बनेगा और सर्वदलीय बैठक में फैसला लिया जायेगा तो एक बार फिर से आन्दोलन भड़क उठा कि सरकार अपने वायदे के खिलाफ जा रही है.
9 दिसंबर की अर्धरात्रि को घोषणा तो कर दी, पर ये न सोचा कि उसके नतीजे क्या होंगे. परिणाम सामने है. इधर सरकार ने घोषणा की नहीं कि गोरखालैंड के लिए लोग आमरण अनशन पर बैठ गए. पिछले एक दशक से सोये नेता जाग गए और देखते- ही-देखते पूर्वांचल, हरित प्रदेश, विदर्भ, बुंदेलखंड सहित 11 नए राज्यों की मांगे सामने आ गयीं. अपने पुतले बनवाकर अमर बनने का ख्वाब टुटा तो उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती ने भी पत्ता फ़ेंक दिया और प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर उत्तर प्रदेश के तीन टुकड़े करवाने पर तुल गयीं. भाजपा से निकले गए जसवंत सिंह को लगा ही था कि उनका राजनीतिक जीवन भी अब उनके बुढ़ापे के साथ बुढ़ापे का शिकार होने जा रहा है, उनके हाथ फिर से गोरखालैंड का मुद्दा लग गया. अजित सिंह जो इतने दिनों तक पाता नहीं कहाँ दुबके हुए थे, अचानक हरित प्रदेश के लिए अपना हिस्सा मांगने बिल से निकल आये.
भी बरक़रार है. पृथक तेलंगाना राज्य के गठन में भी बहुत सारी अडचनें हैं. भोगौलिक दृष्टि से हैदराबाद तेलंगाना में आता है. पर याद रहे कि हैदराबाद आंध्र प्रदेश का चेहरा है, जिस पर राज्य सरकार ने न जाने कितना कुछ लुटाया है. ऐसे में फिर वही स्थिति हो जाएगी जो 1953 पोट्टी श्रीरामुलू के साथ हुआ था. आंध्र प्रदेश तो बन गया, पर मद्रास नहीं मिला. यहाँ भी कहीं वैसा ही न हो जाये. चंद्रशेखर राव के हाथ में तेलंगाना तो आ जाये, पर शायद हैदराबाद न आने पाए.
ट तक को तैयार हैं. लेकिन महंगाई को लेकर कोई बवाल नहीं है. सरकारी स्कूलों में मास्टर नहीं आते, उसे लेकर क्रोध नहीं है. हर रोज़ महिलाओं के साथ छेड़खानी होती है, गाँव-गाँव में बलात्कार होते हैं, उसे लेकर कोई आवाज़ उठाने वाला नहीं है. किसान आत्महत्या कर रहे हैं, उसे ले कर कोई बोलने वाला नहीं है. नौकरी के लिए पढ़े-लिखे लोग तरस रहे हैं, पर सरकार से कोई पूछने वाला नहीं है. लेकिन राज्य न मिला तो जान देने और लेने को भी तैयार है. सलाम है जनता की इस सोच को.
हमेशा से विश्व को शांति और अहिंसा का पाठ पढाया है और जिसकी वैश्विक समुदाय के बीच गहरी पैठ बनी है.
न देने और खून बहाने पर आमादा हो सकता है. 16वीं सदी में बाबर द्वारा बलपूर्वक बनाये गए बाबरी मस्जिद में 22 दिसंबर 1949 को हिन्दुओं ने रामलला की मूर्ति स्थापित करके इस विवाद को सदियों बाद जन्म दिया था. हालाँकि उस समय अदालत ने दो समुदायों के बीच पनपे झगडे को देखते हुए इसे विवादित स्थल करार देते हुए, इसे बंद कर दिया था. 1 फ़रवरी 1986 को फैजाबाद सेशन कोर्ट ने इसे हिन्दुओं के लिए पूजा करने को खोल दिया था. 9 नवम्बर 1989 को तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गाँधी ने भी इस स्थल पर शिलान्यास समारोह आयोजित करने की अनुमति दे दी थी. हाँ इस बात से तो सभी वाकिफ हैं कि आखिर इसके पीछे उनकी मंशा क्या थी.
सी क़ुरबानी क्यों नहीं दे देते? धर्मनिरपेक्ष देश कहलाते हुए भी इस देश में उन्हें अल्पसंख्यक का दर्ज़ा देकर विशेष अधिकार दिए गए हैं. तो क्या शांति के लिए वे पीछे नहीं हट सकते?
आरएसएस को हमेशा इस रूप में पेश किया गया कि वो एक हिन्दू संगठन है जो केवल हिन्दुओं की भलाई चाहता है और मुस्लिमों के खून का प्यासा है. ये एक कट्टर हिन्दू संगठन है. पर इस बात को मीडिया ने कितनी बार लोगों को बताया कि आरएसएस की शाखाओं में आज भी सुबह-शाम बुजुर्गों से लेकर बच्चों तक को हर रोज़ देश से प्यार करना सिखाया जाता है. उन्हें प्रेरक-प्रसंग, सुभाषित, बौद्धिक, स्वदेशी खेलों आदि के माध्यम से भारत की भूमि से जोड़े रखने का प्रयास किया जाता है. आज के समय में कितने संगठन निःस्वार्थ भाव से ये काम कर रहे हैं?
भूल का फ़ायदा उठाकर अपना जेब भरने में लगे हैं. वो कभी नहीं चाहेंगे कि हम एकजुट हों.
s have forgotten what they are supposed to report and what not. Perhaps this quote of an American-born British violinist Sir Yehudi Menuhin seems very suitable in this context. He once said, “Whenever I see a newspaper, I think of the poor trees. As trees they provide beauty, shade and shelter, but as paper all they provide is rubbish.” Even Arnold Bennett, an English Novelist once said, “Journalist say a thing that they know isn’t true in the hope that if they keep on saying it long enough it will be true.”
ndia in January 1991. They were found guilty in a few instances of playing with the pictures, such as drawing prison bars on the photograph of an arrested mahant, formulating causality figure.
on November 2 in a special bulletin that afternoon, but at the last moment ‘1’ was inserted by hand to make it ‘115’. The item remained credited to the news agency ‘Univarta’ even after this charge. This is unethical, in addition to being totally irresponsible.
m. They should remember that comments and value judgments should not be motivated or guided by partisan feeling. Newspapers are not there to bring the smile only on readers’ face but they have to report the truth whether it brings smile or force the reader to think seriously on the issue.