शुक्रवार, 16 अक्टूबर 2009

आपको पैदा करने की ये कैसी सजा ?

शैलेश कुमार

उनके पास तो अब केवल सिसकियाँ ही बची हैं. छुप-छुप के आंसू बहाने के सिवा उनके पास और बचा ही क्या है? कहने को बस एक ही सदस्य कम हुआ हो, पर परिवार तो पूरा बिखर गया ना. किसी एक परिवार की कहानी नहीं है ये. देश भर में लाखों ऐसे परिवार हैं जिनके जिगर के टुकड़े कभी नक्सल, तो कभी आंतकवादी, कभी गुंडे, तो कभी खुद पुलिस का शिकार होकर हमेशा के लिए इस दुनिया से विदा ले लिए. हाँ दो-चार दिन के लिए मीडिया ने उन्हें मरने के बाद हीरो बनाया, मरणोपरांत सरकार ने मेडल देकर सम्मानित किया. लेकिन उसके बाद क्या हुआ? इतिहास के पन्नों में कहीं दब गए वे. पता नहीं किस लाइब्रेरी में और कहाँ दीमक खाती किताबों में दब गयी उनकी वीरता की गाथाएं.

पर जिस देश, जिस प्रदेश, जिस जनता के लिए उन्होंने अपना बलिदान दिया, उन्हें क्या मिला इसके बदले? बोफोर्स और चारा घोटाला? बेरोजगारी और भुखमरी? सूखा और बाढ़? अपहरण और बलात्कार? हत्या और डकैती? महंगाई और प्याज के आंसू? या फिर किसानों की आत्महत्या और उसे भुनाकर सत्ता में काबिज होते चटोरे जनप्रतिनिधि?

दशकों से बस एक ही बात कहते आ रहे हैं, नक्सल देश के लिए खतरा है, आतंकवाद देश के लिए सबसे बड़ी चुनौती है. भ्रष्ट्राचार हर बुराई की जड़ है. मंत्री जी अब तो छोटा बच्चा भी टीवी चैनलों पर आपकी इन बातों को सुनकर समझ गया है कि ये सभी चीज़ें बुरी है, मुसीबत है. पर सिर्फ बोलते ही रहेंगे, या कुछकरेंगे भी? करेंगे तो कब करेंगे, तब जब सौ में से अस्सी परिवार का सपूत इनकी आड़ में पिस चुका होगा? या फिर तब, जब लोगों की अर्थी को कन्धा देने के लिए उनके परिवार का एक भी सम्बन्धी जिन्दा नहीं होगा? या फिर आप उस दिन का इंतज़ार कर रहे हैं जब टुकडों में बँटा होगा यह देश, और उसकी नीलामी हो रही होगी?

अरे बंद कीजिये ये घिसे-पिटे भाषण, झूठी सहानभूति और झूठे वादे. आप क्या सोचते हैं, कुछ हथियारबंद पुलिस वालों को जंगल में उतार कर आप नक्सलवाद को मिटा देंगे? कारगिल की पहाडियों पर चंद सैनिकों को चढाकर आतंकवाद को मिटा देंगे? दंगे फसाद के समय रैपिड एक्शन फोर्स को बुलाकर दंगे रुकवा देंगे? या फिर नरेगा जैसी भ्रस्ट स्कीम को लाकर किसानों को आत्महत्या करने से रोक लेंगे? नहीं, आप ऐसा नहीं कर सकते. ये आपको भी पता है.

फिर क्या चाहते हैं आप? जनता की भलाई का झूठा नाटक कर उनका विश्वाश जीतना? उनके पैसों पे फाइव स्टार होटलों में रहकर ऐश करना? या फिर अपना उल्लू सीधा करने के लिए देश को ही बेच देना? माफ़ कीजियेगा, थोड़े कटु शब्दों का प्रयोग किया है मैंने, पर ये तो बतला दीजिये इसमें से कितना परसेंट गलत है? बताइए, बताइए...

हे सरकार, प्रभु, हमारे माई-बाप, अगर हम देशवासियों की आपको इतनी ही फिक्र है तो मत चलवाइए जंगलो में गोली. बंगाल से सबक मिल ही गया होगा. जाइये उनकी समस्याओं से रूबरू होइए और उसे हल कीजिये. नक्सलवाद अपने आप समाप्त हो जायेगा. हेलीकॉप्टर से यात्रा करने पर तो बाढ़ में भी आपको हर जगह पानी का लेवल एक जैसा ही दिखता होगा, जरा नीचे उतरकर उस पानी में चलकर उसकी गहराई को तो नापिये. लोगों को दो वक़्त की रोटी का जुगार करा दीजिये, असंतोष मिट जायेगा. ये मिटा तो आतंकवाद भी कम होगा. नरेगा को चलने दीजिये, पर कभी ये तो देखिये की उसका लाभ वास्तव में किसानो और ग्रामीणों को मिल भी पा रहा है या नहीं? फिर देखिये किसानो की आत्महत्या कैसे कम होती है?

मंत्री जी भाषण तो आप लिखा हुआ पढ़ देते हैं, पर कभी ये तो जानने की कोशिश कीजिये की जो आई.ए.एस अधिकारी आपकी जी-हुजूरी बजाकर आपके लिए यह भाषण लिख रहा है, उसने अपनी पढाई के दौरान क्या-क्या कष्ट झेला है? राजनीति को गन्दा बनाने से पहले एक बार ये तो सोचिये कि कितने लाख लोगों कि हाय आपको लगने वाली है? देश को बेचने से पहले एक बार यह तो सोच लीजिये कि उसका कसूर क्या है? क्या यही कि उसने आप जैसे नेता को पैदा किया?

... आपको पैदा करने की ये कैसी सजा है?

रविवार, 20 सितंबर 2009

महानता को सलाम

शैलेश कुमार

अपने देश को महान कहना अच्छी बात है. उसकी वंदना करना और भी अच्छी बात है. लेकिन क्या इससे अच्छी बात कुछ और सकती है कि देश के साथ हम भी महान बने - महान अपनी सोच में, महान अपने कर्म में, महान अपनी राजनीति में और महान अपनी नज़रों में?

लेकिन यह महानता आएगी कैसे? अपना दुखरा रोकर? देश कि बर्बादी के लिए दूसरो को दोष देकर? सामने समानता कि बात करके, वक़्त आने पर जात-पात का साथ देकर? वोट देने के बाद चुपचाप बैठकर? या फिर अख़बारों और न्यूज़ चैनल्स में क्राईम के खिलाफ चिल्लाने के बाद, उसी को छुपाने के लिए पैसे खाकर?

इसका भी जवाब देने में बहुत से लोग समय लेंगे, क्योकि उनकी सोच 'मैं' में इतनी डूब गयी है कि उन्हें अब 'हम सब' के लिए सोचने का वक़्त ही नहीं है। आवाज़ उठाने के लिए कड़ोरों कि पोपुलेशन है, पर उनमे से कुछ के ही गले में आवाज़ है. आँखें तो सभी कि खुली हैं, पर सच्चाई को मानने कि ताकत केवल कुछ में ही है.

आखिर क्यों बिहार में बाढ़ और सूखे के बाद भी केंद्र ने मदद देने में विलंब क्या? अगर राज्य सरकार की केंद्र ने नहीं सुनी तो जनता ने क्यों नहीं आवाज़ बुलंद किया? यूपी में मायावती पुतलों पर अरबों लुटती रही। पैसा तो जनता का था, फिर सुप्रीम कोर्ट का निर्णय आने का इंतज़ार क्यों किया? खुद क्यों नहीं आवाज़ बुलंद किया? बंगाल से टाटा बाहर जाता रहा, विकास को धक्का लगता रहा, फिर भी जनता ने विरोध क्यों नहीं किया? कश्मीर में आंतकवादी घुसते रहे, जवान उन्हें खदेड़ते रहे, पर स्थानीय जनता ने उन्हें क्यों नहीं खदेडा? विदर्भ में किसान मरते रहे, राजनीतिक रोटियां सेंकी जाती रहीं, पर उन मरते किसानो को किसी ने अनाज क्यों नहीं दिया? मुंबई हमले में आप मरते रहे, पर आंतकियों का सामना क्यों नहीं क्या?

अनाज के लिए आम आदमी मरता रहा और दो केबिनेट मंत्री हर रोज़ लाखों खर्च करके फाइव स्टार होटल में रहते रहे। जब हंगामा मचा तो सोनिया गाँधी को 'सादगी' का मंत्र याद आया. सोचा कुछ हज़ार बचा कर कड़ोरों का पेट पालेंगे. पर भ्रष्ट्राचार पर नियंत्रण करने के लिए क्या क्या? काला धन वापस लाने के लिए क्या किया? सीबीआई को स्वंत्रता देने के लिए किया क्या? कितने भ्रष्ट और घोटालेबाज मंत्रियों और नेताओं के खिलाफ कार्रवाई की? राष्ट्रीय रोजगार गारंटी योजना को पारदर्शी बनाने के लिए क्या किया? अफज़ल जैसे आंतकियों को सजा दिलाने के लिए क्या किया?

पर हमने क्या ना। वोट डालकर शांति से बैठ गए. राजनीति के गंदे खेल को टीवी पर देखकर मज़ा लेते रहें. काली कमाई की धार में अपना भी हाथ धोते रहें. ट्रैफिक जाम की शिकायत करते रहें, पर टू व्हीलर और फॉर व्हीलर से नीचे उतरने का नाम नहीं लिया? बसों में लटक कर जाते रहें, पर दो मिनट रूककर दूसरी बस का इंतज़ार नहीं किया. लोगों पर नियमों की अनदेखी का आरोप मढ़ते रहें, पर कभी शायद ही खुद नियम का पालन किया. नेताओं को गलियां देते रहें, पर सामने आने पर उनके सामने पैरवी के लिए दुम हिलाते रहें. वन्दे मातरम तो गाते रहें, पर दिल में दर्दे डिस्को चलता रहा. जय हो की तारीफ करते रहें, पर मन में तो कैसे जल्दी से करोड़पति बने, यही चलता रहा.

तो हैं न हम महान? वाह वाह, वाह वाह. अरे आपके लिए नहीं कह रहा हूँ. मैं तो अपने लिए वाह वाह कर रहा हूँ. आखिरकार एक महान इंसान ने आप जैसे करोडों महान इंसानों की महानता को जो ढूंढ़ निकला है.

गुरुवार, 10 सितंबर 2009

ये वही दिल्ली है जहाँ अगले साल कोमन वे़ल्थ गेम्स आयोजित होने जा रहे हैं.

शनिवार, 29 अगस्त 2009


आडवाणी से भाजपा...


स्वतंत्र भारत के तिन धरोहर, अटल, आडवाणी और मुरली मनोहर। ऐसा मैंने आज से १५ साल पहले इलाहाबाद में दीवार पर चिपके पोस्टर्स में पढ़ा था। इसमें कोई शक नहीं की आडवाणी का भाजपा के निर्माण में बहुत बड़ा योगदान रहा है. बहुत बड़ा क्या, हम यों कह सकते हैं की वे शुरू से पार्टी की रीढ़ की हड्डी बनकर रहे हैं. हो सकता है की पिछले कुछ समय से अपनी गतिविधियों को लेकर वे आलोचन के शिकार रहे हैं. पर इससे उनकी कार्यक्षमता पे ऊँगली नहीं उठाई जा सकती.


भाजपा के वर्तमान रजनीतिक संकट को अगर कोई हल कर सकता हैं तो वे आडवाणी ही हैं। उन्होंने इस पार्टी के लिए अपना खून और पसीना बहाया है. जाहिर सी बात है की पार्टी की जितनी चिंता उन्हें होगी, उतनी शायद पार्टी में किसी और को ना हो.


फिर भी गलतियाँ तो उनसे हुई हैं और इसका पश्चाताप तभी हो सकता है, जब वे अपने निजी हितों को एक किनारे रखते हुए, पार्टी की लीडरशिप के बारे में सोचे और योग्य व्यक्ति को मौका दें. पार्टी को एक ऐसे नेता की जरुरत है, जिसका विवादों से कोई नाता ना हो, और सभी उसका समर्थन करें. यह एक जटिल काम है और इसका निर्वाह आडवाणी से बेहतर और कौन कर सकता है.

भाजपा से जो भी नेता बाहर गए हैं, उनमे से अधिकांश पार्टी के वरिष्ठ नेता रहे हैं। आडवाणी को चाहिए की वे उनके साथ बैठक करें, उनके विचारों को सुने, और उन्हें मनाकर पार्टी में वापस ले आये. उनका पार्टी से जाने का मतलब है - पार्टी को बहुत बड़ा नुक्सान. भाजपा को फिर से संगठित करने का प्रयास आडवाणी से अच और कोई नहीं कर सकता. क्योंकि वो पार्टी की नब्ज हैं. और सही मायने में वही हरेक नेता के राग-राग से वाकिफ हैं.


आडवाणी के साथ भाजपा के जिन नेताओं को निष्कासन झेलना पड़ा है, गलती उनकी भी है। जब आप एक पार्टी के अंदर एक सामान लक्ष्य के पीछे चलते हैं तो विचारों में मतभेद होने के बाद भी एक सामान विचारधारा बनाकर, लक्ष्य को पाने का प्रयास किया जाता है. पार्टी के खिलाफ जाकर बगावत का विगुल बजाना या फिर पार्टी छोड़ कर चले जाने में कोई बुद्धिमानी नहीं है. ऐसा करके आप बस अपने विरोधियों को आपके ऊपर हावी होने का मौका दे रहे हैं. खासकर तब, जब चुनावों में जनता के बिच आपकी पैठ कमजोर हुए है.


संघ को असंतुष्ट करके भाजपा कभी भी आगे नहीं बढ़ सकती। आखिर संघ से ही तो इसकी उपज हुई है. कुछ समय पहले भाजपा अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने संघ को दो टूक जवाब दिया था कि संघ का काम संगठन चलाना है और उनका काम शाषण चलाना. इसीलिए संघ पार्टी के मामलों में हस्तक्षेप ना करे. संघ ने उसके बाद बिलकुल चुप्पी साथ ली. और इसका नतीजा भाजपा ने लोकसभा चुनावों में देख लिया. भाजपा नेताओं को तो गर्व होना चाहिए कि उसके सर पे संघ का हाथ है, जो कभी भी उनकी डूबती नैया को बचा सकता है.


भाजपा ये कतई ना भूले कि देश को कांग्रेस के चंगुल केवल वो ही निकल सकती है। ये जगजाहिर है कि कांग्रेस ने देश के लिए क्या किया है. कांग्रेस सत्ता में वापस आई तो, कहीं न कहीं ये भाजपा कि आपसी कलह का भी परिणाम था. इसीलिए अभी भी समय है. देश कि जनता को भाजपा से जो उमीदें हैं, वह उन पर खडा उतरे.


आडवाणी कि जरुरत हमेशा ही पार्टी को है। पर वो उन्हें भी मौका दें, जो भाजपा को पुनः शीर्ष पर पहुचने का दमख़म रखते हैं, पर अब तक उन्हें यह मौका नहीं मिल पाया है. युवा शक्ति को भाजपा पहचाने, और उसे आज़मां के देखे.


भाजपा के लिए यही सन्देश है:संगठन गढे चलो, सुपथ पर बढे चलो.भला हो जिसमे देश का, वो काम सब किये चलो.

आडवाणी अब ले ही डूबेंगे...
कभी कांग्रेस का विकल्प बनकर भारतीय राजनीति में उभरी भारतीय जनता पार्टी को देखकर आज कोई नहीं कह सकता की भारतीय राजनीति में यह राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का अप्रत्यक्ष रूप से प्रतिनिधित्व करता है। भाजपा के नेताओं को देश में अधिक सम्मान इसीलिए प्राप्त है की इनमे से अधिकांश नेता संघ की पृष्ठभूमि से आए हैं। और संघ के स्वयंसेवक अपने अनुशासन के लिए जाने जाते हैं।

भाजपा के वर्तमान स्वरुप को देखकर विश्वाश ही नहीं होता कि ये वही भाजपा है जो जनसंघ से निकल कर आई है। और जिसने देश को श्यामा प्रसाद मुख़र्जी और अटल बिहारी वाजपेयी जैसे महान नेता दिए हैं।

आडवाणीजी पर तो मुझे तरस आता है। इतने दिन तक राजनीति में रहकर भी अभी तक सत्ता का मोह गया नहीं। अपनी उम्र तक का उन्हें अब लिहाज़ नहीं रहा है। और शायद यही वजह है कि वे अपनी हरकतों से बार-बार विवादों के घेरे में आ जा रहे हैं।

आडवाणीजी तो संघ के प्रचारक रह चुके हैं। एक प्रचारक को दुनिया कि सुख सुविधाओं का कोई मोह नहीं होता। वह तो सिर्फ़ समाज के लिए ही जीता है और गुमनामी कि ज़िन्दगी जीकर मर भी जाता है। फिर आडवाणीजी में क्यों नहीं दिखती वह बात? यदि उन्हें अपनी प्रतिष्ठा का कोई ख्याल नहीं रहा तो कम से कम संघ कि प्रतिष्ठा को तो तार-तार वे ना करें।


एक उदहारण देता हूँ आपको। यदि आपको याद हो तो ये वही आडवाणी हैं जो कभी बाबरी मस्जिद को बाबरी मस्जिद नहीं, एक विवादित ढांचा कहकर पुकारते थे। पर चुनाव के समय उनके सर पर प्रधानमंत्री बनने का ऐसा भूत सवार हुआ कि वे अब इसे बाबरी मस्जिद कहकर पुकारने लगे। इसे कहते हैं सत्ता का मद। इसके लिए वे अपने सिद्धांतों को भी भूल गए।

आज जब पार्टी टूट के कगार पर जा पहुची है, उसके बावजूद आडवाणी कि तरफ़ से इस कलह को खत्म करने का कोई ठोस प्रयास नही दिख रहा। अभी भी इनका इगो इन्हें वैसे कदम उठाने से रोक रहा है, जो पार्टी के हित में हों। आपको बता दूँ कि ये जिन्ना का भूत नहीं है जो सबको परेशान कर रहा है। ये जिन्ना तो भाजपा को बस एक बहने के रूप में मिल गया है। अगर जिन्ना का ही मुद्दा होता तो जसवंत के निष्कासन कि नौबत कभी नहीं आती, क्योंकि जिन्ना के बारे में आडवाणी का बयां जसवंत की किताब में लिखे वचनों से कहीं ज्यादा खतरनाक था। दरअसल आडवाणी को आभास हो गया था कि पार्टी के कुछ वरिष्ठ नेता पार्टी में बदलाव लेन कि कोशिश कर रहे हैं। और यदि ऐसा होता तो इसका सीधा मतलब था आडवाणी के हाथ से पार्टी का निकलना।

ऐसे में आडवाणी ने राजनाथ और कुछ अन्य के साथ मिलकर आवाज़ बुलंद कर रहे नेताओं को बाहर निकलने कि थान ली। और संयोग से जिन्ना प्रकरण ने उन्हें सही अवसर भी दे दिया। जसवंत सिंह, अरुण शौरी जैसे सिर्शस्था नेताओं का पार्टी से निकला जाना भाजपा के पतन का द्योतक है। वे केवल नेता ही नहीं, बल्कि कुशल विचारक और विद्वान भी हैं। निरक्षर नेताओं की भीड़ के बीच देश को ऐसे नेताओं कि जरुरत है।

संघ लगातार कहता आ रहा है कि पार्टी को युवा नेताओं को मौका देना चाहिए। पर आडवाणी जिन्हें अपनी कुर्सी कि पड़ी है, उनकी कानों पर जू तक नहीं रेंग रही। संघ ने भी इस मामले से अपने पैर पीछे खिंच लिए हैं। अब भाजपा कि नैया बीच मंझधार में डोलती नज़र आ रही है। अभी भी अगर आडवाणी अपनी ही जिद पर अडे रहे तो अब भाजपा के पतन को कोई रोक नहीं पायेगा। कांग्रेस कि इस्थिति लगातार मजबूत होती जा रही है। इसका मुकाबला ऐसी बिखरी हुई पार्टी कभी नहीं कर सकती।

आडवाणीजी अभी भी वक्त है। संभल जाए। नहीं तो आप तो डूबेंगे ही, इतने मेहनत से तैयार कि पार्टी को भी ले डूबेंगे।

मंगलवार, 25 अगस्त 2009

शाहरुख़ का अपमान

- बस 'एक बार' ही होता है




दिवस था ये आज़ादी का

लहरा तिरंगा आसमान में।

नम हो गई आँखें हजारों

अमर शहीदों की यादों में।



समाचार में बस आज़ादी

और कुछ ना दीखता था।

रंग बिरंगे आज़ादी का

केवल पर्व झलकता था।



पर बदली तस्वीर अचानक

शाहरुख़ अब टीवी पर था।

तिरंगा लहराता आकाश में

अब कहीं न दीखता था।



भुला दिया शहीदों को अपने

अब तो शाहरुख़ ही सब था।

समर्पण, त्याग और बलिदान पे

शाहरुख़ का इंतज़ार बस भारी था।



कौन दिखाए पी एम् का भाषण

शाहरुख़ जो संकट में था।

कौन सुनाये वीरों की गाथा

शाहरुख़ से कहाँ फुर्सत था?



स्वाधीनता दिवस मानाने का

ये कैसा तरीका था?

पूछा मैंने जब पत्रकार से

जावाब मिला कुछ ऐसा था।



आज़ादी का दिवस हरेक साल में

हर एक बार आता है।

पर शाहरुख़ का ऐसा अपमान तो

बस एक बार ही होता है।



उत्तर सुन उस पत्रकार का

हिल उठा मैं अन्दर से।

किसे दोष दूँ ये सोचके

सिसकने लगा मैं एकदम से।

शुक्रवार, 13 मार्च 2009

नेताओं की मेहरबानी से
शैलेश कुमार
चुनाव का बिगुल एक बार फिर से बज चुका है. लोकसभा चुनाव और कई राज्यों मे विधान सभा चुनाव सर पर हैं. राजनीतिक दलों ने एक बार फिर से अपने-अपने पत्ते फेंकने शुरू कर दिए हैं। जोड़-तोड़ शुरू हो गई है. आरोप-प्रत्यारोप का दौड़ भी शुरू हो चुका है.
एक बार फिर से बड़े-बड़े वादे किए जा रहे हैं। जनता-जनार्दन की याद फिर से राजनेताओं को आई है. पाँच साल तक जिन्हे अपनी जनता को प्रणाम करने तक की याद नही थी, वे आज उनके चरण छूने को भी तैयार हैं.
इस बार फिर से चुनाव घोषणा पत्र बने हैं। बड़े-बड़े वादे किए गये हैं। रोज़गार बढ़ने और ग़रीबी हटाने की बात लिखी गई है. अपने आप को धर्मनिरपेक्ष सिद्ध करने की मुहिम जारी है.
इन्हीं सब बातों को तो हिन्दुस्तान की आवाम पिछले साठ वर्षों से सुनती चली आ रही है। कितनी ही सरकारें आई और चली गई लेकिन भूख, ग़रीबी व बेरोज़गारी आज भी वही की वही हैं। इतने सालों मे जापान कहाँ से कहाँ पहुँच गया, पर भारत केवल सरकार चुनने और सरकार गिराने मे ही लगा रहा.
एक के बाद एक सरकार आती रही और जनता को लूटती रही। विकास के नाम परग़रीबों को ग़रीब और अमीरों को अमीर बनाती चली गई। पन्नों पर विकास दिखता गया पर देश अंदर से खोखला होता चला गया.
ग़रीबी से तंग आकर किसान आत्महत्या करते रहे। भूखे और नंगे बच्चे सड़कों पर भीख माँगते रहे। असहाय महिलाएँ हर रोज़ अपनी अस्मत लूटाकर अपना और परिवार का पेट पालती रहीं. माननीय नेतागण जनता के बीच जाति और संप्रदायवाद का बीज बोते रहे और उन्हे आपस में लड़ाकार अपना उल्लू सीधा करते रहें।
इन साठ सालों मे पता नहीं इस देश ने क्या पाया, पर हमारे नेताओं की मेहरबानी से स्लम्डॉग बनाकर एक ऑस्कर ज़रूर पा लिया। आगे भी सरकारें आती रहेंगी, और हर पाँच साल मे कम से कम एक ऑस्कर तो ज़रूर मिलता रहेगा इन नेताओं की मेहरबानी से.