मंगलवार, 28 अगस्त 2012

निंदा' करें, लेकिन 'विकल्प' भी दें


शैलेश  कुमार


गत दो वर्षों में देश में कई महत्वपूर्ण घटनाक्रम सामने आये. सामाजिक कार्यकर्ता अन्ना हजारे के नेतृत्व में भ्रष्ट्राचार के उन्मूलन के लिए जनलोकपाल को लेकर चलाया आन्दोलन इनमे सबसे प्रमुख था. मेरे ब्लॉग के पाठकों और साथियों ने कहा, भाई कुछ लिखो. देश में इतना कुछ चल रहा है, और तुम्हारी लेखनी खामोश है? बात कुछ जम नहीं रही. मेरे पास इसका कोई जवाब नहीं था. पर आज जब मेरे पास जवाब है तो मै चार लाइन इस ब्लॉग में लिखने जा रहा हूँ.

इस बात का अंदाज़ा मुझे पहले ही था कि भ्रष्टाचार के खिलाफ शुरू हुआ जनांदोलन किस दिशा में जा रहा है और इसका क्या हश्र होगा? चाहता तो जोश में आकर पहले भी आन्दोलन की तारीफों के पुल बांधते हुए कोई अच्छा लेख लिख सकता था. जैसा कि अन्य लोगो ने किया. पहले पलकों पर बिठाया, और आज उतारकर फेंक दिया. वास्तव में इसका सही प्रकार से विश्लेषण किया जाना आवश्यक है क्योंकि हजारे के जनांदोलन ने कहीं-न-कहीं इस अवधारणा को बल प्रदान किया है कि देश अब जाग रहा है. क्रांति की चिंगारी पनप रही है. बस एक सही मार्गदर्शन की तलाश है.


अन्ना की टीम के सदस्यों के बीच पारस्परिक सहयोग के अभाव तथा वैचारिक मतभेदों की वजह जनांदोलन रास्ता भटक गया. खुद हजारे भी यह निर्णय नहीं कर सके कि आखिर वो किस दिशा में जाना चाहते हैं और उनकी रणनीति क्या होगी? अंत में वही हुआ, जो बहुत से लोग नहीं चाहते थे. हजारे ने राजनीतिक राह पकड़ने की घोषणा कर दी. उनके इस निर्णय की वजह से उनसे जुड़े कई लोगों ने उनका साथ छोड़ दिया और उनके खिलाफ हो गए, लेकिन इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि हजारे ने ऐसा करके एक नया मार्ग प्रशस्त कर दिया. एक ऐसा मार्ग, जिसे आमतौर पर लोग घिनौना करार देते हैं. लोकतंत्र के अंतर्गत खुद राजनीति रूपी इस मार्ग का हिस्सा होकर भी इसी की निंदा करते हैं.

आप माने या ना माने, लेकिन इस सच्चाई से कतई मुह नहीं मोड़ सकते कि गंदे कीचड़ को साफ़ करने के लिए आपको खुद कीचड़ में उतरना ही पड़ेगा और कपड़ों को गन्दा करना ही पड़ेगा. हजारे ने भी कुछ ऐसा ही करने का आह्वान किया है. इसमें कोई शक नहीं कि हजारे और उनकी टीम के पास दूरदर्शिता का अभाव है. जनांदोलन को शुरुआती सफलता मिलने के बाद जिस प्रकार से देश की जनता का बड़े पैमाने पर समर्थन पाने का स्वर्णिम मौका उन्होंने अपने हाथ से जाने दिया और गलतियाँ-पे-गलतियाँ करते रहे, उससे यह बात तो स्पष्ट हो गयी कि टीम को चिंतन करने की जरुरत है. एक कुशल योजना बनाकर, चरणबद्ध तरीके से मुहिम चलने की जरुरत है.


स्थिति ऐसी है कि बिना राजनीति में कदम रखे अब आन्दोलन चलेगा नहीं. दूसरे शब्दों में कहें तो राजनीतिक हथियार को अपनाये बिना अब आन्दोलन की सार्थकता नहीं रह जाएगी. भ्रष्टाचार ने जिस प्रकार से पांव फैलाये हैं और जिस प्रकार से लगभग सभी दलों के वरिष्ठ नेताओं का नाम इनमे सामने आया है, उसे देखते हुए यह कहना अतिश्योक्ति नहीं होगी कि इनके सत्ता में रहते कभी इन्हें उनके पापों की सजा नहीं मिल पायेगी. सबके सामने भले ही वे एक दूसरे की टांग खीचते नज़र आते हों, किन्तु हकीकत यही है कि सभी एक ही थाली के चटटे-बटटे हैं. इन्हें सबक सिखाने के लिए इन्हें राजनीति में चुनौती देनी की जरुरत है. तभी वांछित परिणाम मिलने की कोई गुंजाईश है.

बेहतर ये होगा कि लोग सोचने का नजरिया बदले. विशेषकर ऐसे युवा जो वास्तव में भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज बुलंद करना चाहते हैं और देश की तरक्की में योगदान देना चाहते हैं, वे देश की राजनीतिक व्यवस्था को समझे और राजनीतिक जनांदोलन का हिस्सा बने. अन्ना हजारे की निंदा करके कुछ हासिल नहीं होगा. ये मत भूलिए कि जितना उन्होंने किया वह भी आसान नहीं था. वर्षों से लोगो ने आन्दोलन की बात की, पर कितनों ने आख़िरकार नेतृत्व किया? सबने देश की निंदा की, पर कितनों ने आखिर इसे सुधारने का प्रयत्न किया? निंदा करना तभी शोभा देता है, जब साथ में हम उसका विकल्प भी दे. अन्यथा यह नकारात्मक सन्देश देती है और देश को पतन की ओर ले जाने में हमें भी जिम्मेदार बनाती है.
वक़्त आ गया है कि देश के कोने-कोने में बैठे ऐसे सभी लोग जो खुद को ईमानदार मानते हैं और देश की सफाई करना चाहते हैं, वे हजारे की राजनीतिक मुहिम में शामिल हों. स्थानीय स्तर पर मेहनत करें. लोगों के बीच जागरूकता पैदा करें. चर्चा करें, राजनीति की जानकारी लें. चुनाव लड़ने की रणनीति बनाये. एक जैसी सोच रखने वाले और बदलाव लाने की ख्वाहिश रखने वाले ऐसे लोग जिस दिन सत्ता में आ गए, उस दिन जनांदोलन सफल होगा. यह काम आसान नहीं है. कई बार मुह की खानी पड़ेगी, पर कभी तो सफलता मिलेगी. जरुरी नहीं कि अन्ना हजारे के नेतृत्व में ही लड़े, लेकिन ये नहीं भूले कि उन्होंने रास्ता दिखाया है और उस पर चलने का साहस भी.

देश में कुछ अच्छा होने के आसार दिख रहें हैं. हम कुछ शुभ करने जा रहे हैं. तो चलिए इसी बात पर मुह मीठा हो जाये. :-)

Feedback: shaileshfeatures@gmail.com

शुक्रवार, 17 दिसंबर 2010

कुपोषित भारत के पोषित मंदिर

संकलन: शैलेश कुमार

संख्या की दृष्टि से दुनिया में सबसे अधिक निर्धन लोग भारत में रहते हैं। इस बात का खुलासा लोकमित्र विश्व खाद्य कार्यक्रम में हुआ है। शायद यही कारण है कि दुनिया में भुखमरी से जितने लोग पीडि़त हैं उनमें से 50 फीसदी अकेले भारत में रहते हैं।जिस देश में सबसे ज्यादा गरीब रहते हैं, उसी देश में सबसे ज्यादा अमीर मंदिर स्थित हैं। वैसे यह बताना तो मुश्किल है कि भारत में कुल कितने मंदिर हैं, लेकिन एक अनुमान के मुताबिक भारत में 10 लाख से भी अधिक मंदिर हैं और इनमें से 100 मंदिर ऐसे हैं जिनका सालाना चढ़ावा भारत के बजट के कुल योजना व्यय के बराबर होगा। अकेले 10 सबसे ज्यादा धनी मंदिरों की ही संपत्ति देश के 100 मध्यम दर्जे के टॉप 500 में शामिल उद्योगपतियों से अधिक है।
धन और धार्मिक मान्यता के लिहाज से भारत के इन धनी मंदिरों में तिरुमला का वेंकटेश्वर मंदिर सबसे आगे है, जो तिरुपति बालाजी का मंदिर के रूप मे ंलोकप्रिय है। करीब 300 ईसवी के आसपास बने भगवान विष्णु के वेंकटेश्वर अवतार के इस मंदिर में रोजाना तकरीबन 50 हजार से भी अधिक श्रद्धालु पहुंचते हैं। वर्ष के कुछ विशेष दिनों जैसे नवरात्रि के दिनों में तो यहां 20 लाख तक श्रद्धाुल रोजाना दर्शन करने पहुंचते हैं। बड़ी संख्या में यहां सिर्फ श्रद्धालु ही नहीं आते, बल्कि उनका चढ़ावा भी बहुत भारी-भरकम होता है। नवरात्रि के दिनों में ही 12 से 15 करोड़ रुपये नकद और कई मन सोना चढ़ जाता है। बालाजी के मंदिर में इस समय लगभग 50,000 करोड़ रुपये की संपत्ति मौजूद है, जो भारत के कुल बजट का 50वां हिस्सा है। तिरुपति के बालाजी दुनिया के सबसे धनी देवता हैं, जिनकी सालाना कमाई 600 करोड़ रुपये से अधिक है। यहां चढ़ावे को इक_ा करने और बोरियों में भरने के लिए बाकायदा कर्मचारियों की फौज तैनात है। पैसों की गिनती के लिए एक दर्जन से ज्यादा लोग मौजूद हैं और लगातार उनकी शिकायत रहती है कि उन पर काम का बोझ बहुत ही ज्यादा है। किसी-किसी दिन तो ऐसा भी होता है कि तीन से चार करोड़ रुपये तक का चढ़ावा चढ़ जाए और रुपये-पैसे गिनने वाले कर्मचारी काम के भारी बोझ से दब जाएं। यह तो तब है, जब बालाजी के मंदिर में आमतौर पर लोग छोटे नोट नहीं चढ़ाते।यहां सोना, चांदी, हीरे, जवाहरात व प्लेटिनम की ज्वेलरी तो चढ़ती ही है, सुविधा के लिए भक्त इनका ब्रांड भी खरीदकर चढ़ा सकते हैं। बालाजी के मंदिर में हर वर्ष 350 किलोग्राम से ज्यादा सोना और 500 किलोग्राम से ज्यादा चांदी चढ़ती है। यह कोई आज का सिलसिला नहीं है। जब अंग्रेज भारत आए थे तो वह बालाजी मंदिर की शानो-शौकत और चढ़ावा देखकर दंग रह गए थे। कहते हैं ईस्ट इंडिया कंपनी बड़े पैमाने पर बालाजी मंदिर से चांदी खरीदती थी। वर्ष 2008-09 का बालाजी मंदिर का बजट 1925 करोड़ रुपए का था। इस मंदिर की देखरेख करने वाले तिरुमाला तिरुपति देवस्थानम ट्रस्ट ने 1000 करोड़ रुपये की फिक्स डिपोजिट कर रखी है।कुछ माह पूर्व कर्नाटक के पर्यटन मंत्री जनार्दन रेड्डी ने हीरा जडि़त 16 किलो सोने का मुकुट भगवान बालाजी को चढ़ाया था। जिसकी घोषित कीमत 45 करोड़ रुपये थी। दरअसलए येदयुरप्पा सरकार की नाक में दम करने वाले बेल्लारी के रेड्डी बंधुओं ने खनन कारोबार में 4,000 करोड़ रुपये का मुनाफा कमाया था। उसी मुनाफे का 1 प्रतिशत इन्होंने भगवान बालाजी को बतौर कमीशन अदा किया था, लेकिन आप यह न सोचें कि भगवान वेंकटेश्वर या बालाजी को पहली बार इतना महंगा मुकुट किसी भक्त ने भेंट किया होगा। वास्तव में बालाजी के मुकुटों के भंडार में यह 8वें नंबर पर ही आता है। इस तरह के उनके पास पहले से ही करीब 15 मुकुट हैं।भारत के प्रमुख धनी मंदिरों के पास इतना सोना है, जितना सोना शायद भारतीय रिजर्व बैंक के पास भी न हो। अकेले शीर्ष 100 मंदिरों के पास ही 7 अरब अमेरिकी डॉलर के बराबर का सोना है। बालाजी का मंदिर देश का अकेला धनी मंदिर नहीं है। देश में और भी कई मोटा पैसा बनाने वाले मंदिर हैं।
केरल का गुरुवयूर मंदिर, शिरडी के साई बाबा का मंदिर, मुंबई का सिद्धिविनायक मंदिर, जम्मू का माता वैष्णो मंदिर, गांधी नगर का अक्षरधाम मंदिर, विशाखापट्टनम का सीमाचल मंदिर, पुरी का जगन्नाथ मंदिरए कोलकाता का काली मंदिर और अमृतसर का स्वर्ण मंदिर ऐसे ही मंदिरों में शामिल हैं।गुरुवयूर देवस्थानम ऐक्ट 1971 के जरिए संचालित सबरीमाला पहाडिय़ों में स्थित केरल का यह मंदिर यों तो चढ़ावे के मामले में भले बालाजी के सामने न टिकता हो, लेकिन इस मायने में यह अनोखा मंदिर है कि जनवरी 2010 में महज 15 दिनों में ही यहां 120 करोड़ रुपये से ज्यादा का चढ़ावा चढ़ गया। यहां भगवान अयप्पा स्वामी के भक्त दिल खोलकर दान करते हैं।दुनिया में अगर किसी एक मंदिर में 1 साल में सबसे ज्यादा श्रद्धालु दर्शन के लिए पहुंचते हैं तो वह यही गुरुवयूर मंदिर ही है। जहां औसतन 5 से 5।5 करोड़ लोग हर साल दर्शन करने पहुंचते हैं। यह संख्या इसलिए मायने रखती है, क्योंकि यह मंदिर पूरे साल नहीं खुलता। साल के कुछ दिनों में ही खुलता है। त्रिशूर जिले में स्थित इस मंदिर में विशिष्ट पूजा के लिए वर्ष 2049 तक की बुकिंग हो चुकी है। यह तब है, जबकि यह विशिष्ट पूजा 50,000 रुपये में होती है। गुरुवयूर मंदिर के 125 करोड़ रुपये विभिन्न बैंकों में फिक्स डिपोजिट करके रखे गए हैं।धनी मंदिरों की कतार में माता वैष्णो देवी का मंदिर भी शामिल है, जिसकी सालाना कमाई 500 करोड़ से भी अधिक है। मजे की बात तो यह है कि इस मंदिर का इतिहास बहुत पुराना नहीं है, जैसा कि दक्षिण के अमीर मंदिरों का है। नया-नवेला होने के बावजूद वैष्णो देवी का मंदिर दक्षिण के हजारों साल पुराने मंदिरों के वैभव से टक्कर लेता है। इस मंदिर की देखरेख माता वैष्णो देवी श्राइन बोर्ड करता है। जिला जम्मू में कटरा के निकट स्थित माता वैष्णो देवी का मंदिर देश का दूसरा ऐसा मंदिर है, जहां सबसे ज्यादा भक्त दर्शन के लिए पहुंचते हैं। जबकि मंदिर सीधी 5,200 फीट की चढ़ाई के ऊपर स्थित एक गुफा में है। यह मंदिर जिस पहाड़ी पर स्थित है, उसका नाम त्रिकुट भगवती है। इस मंदिर के सीईओ आरके गोयल ने 2009 में बताया था कि हर गुजरते दिन के साथ मंदिर की आय बढ़ती जा रही है।धनी मंदिरों की फेहरिस्त में इन दिनों चरम लोकप्रियता की ओर बढ़ रहे शिरडी का साई बाबा मंदिर भी शामिल है, जिसकी दैनिक आय 60 लाख रुपये से अधिक है और सालाना आय 210 करोड़ रुपये की सीमा पार कर चुकी है। शिरडी साई बाबा सनातन ट्रस्ट द्वारा संचालित यह मंदिर महाराष्ट्र का सबसे धनी मंदिर है, जिसकी कमाई लगातार बढ़ रही है। मंदिर के प्रबंधकों के मुताबिक 2004 के मुकाबले अब तक 68 करोड़ रुपये से ज्यादा की सालाना बढ़ोतरी हो चुकी है। यहां भी बड़ी तेजी से चढ़ावे में सोने और हीरे के मुकुटों का चलन बढ़ रहा है। चांदी के आभूषणों की तो बात ही कौन करे।महाराष्ट्र में ही एक और धनी मंदिर स्थित हैए मुंबई का सिद्धिविनायक मंदिर। इस मंदिर की सालाना कमाई 46 करोड़ रुपये वर्ष 2009 में पहुंच चुकी थी, जिसमें मंदी के बावजूद इस साल इजाफा ही हुआ है।
सिद्धिविनायक मंदिर का भी 125 करोड़ रुपये का फिक्स डिपोजिट है। महाराष्ट्र के इस दूसरे सर्वाधिक धनी मंदिर की सालाना कमाई कुछ साल पहले 3 करोड़ रुपये थी जो पिछले साल एक दशक में बहुत तेजी से बढ़ी है। मंदिर के सीईओ हुनमंत बी जगताप के मुताबिक देश और विदेश में भक्तों की आय बढऩे के कारण मंदिर की भी आय में भारी इजाफा हुआ है। इस इंटरनेट के जमाने में मंदिर दर्शन कराने के मामले में ही नहीं, चंदा वसूल करने के मामले में भी हाईटेक हो चुका है। यही कारण है कि मंदिर में 1 लाख रुपये से लेकर 6 लाख रुपये तक के सोने और प्लेटिनम के कार्ड उपलब्ध हैं यानी अगर आप चाहें तो 6 लाख रुपये का कूपन खरीद कर भी सिद्धिविनायक भगवान गणेश को चढ़ा सकते हैं, उन्हें कूपन भी पसंद है।कमाई के लिहाज से भले अपनी बड़ी पहचान न रखता हो, लेकिन स्थात्पय की भव्यता और समृद्धि के चमचमाते आकर्षण के कारण अक्षरधाम मंदिर ने बड़ी तेजी से भारतीयों के बीच पहचान बनाई है। फिर चाहे वह गांधीनगर, गुजरात का अक्षरधाम हो या दिल्ली का। गांधी नगर स्थित अक्षरधाम मंदिर की सालाना आय 50 लाख से 1 करोड़ रुपये के बीच है। बोचासनवासी अक्षर पुरषोत्तम संस्थान द्वारा संचालित राजधानी दिल्ली का अक्षरधाम मंदिर दुनिया का सबसे बड़ा हिंदू मंदिर है। इसके पहले यह खिताब कंबोडिया के अंकोरवाट मंदिर को हासिल था। धनी मंदिरों की इस सूची में देश-विदेश के और भी पचासों मंदिर शामिल हैं। पुरी का जगन्नाथ मंदिर, गुवहाटी का कामाख्या मंदिर, झारखंड स्थित देवघर का बाबा वैद्यनाथ का मंदिर, कोलकाता स्थित काली मंदिर, केरल का प्राचीन अयप्पा मंदिर, तमिलनाडु का मुरुगन मंदिर, वृंदावन स्थित बांके-बिहारी का मंदिर, उज्जैन का महाकालेश्वर मंदिर, भुवनेश्वर का लिंगराज मंदिर, बनारस का बाबा विश्वनाथ मंदिर, गुजरात स्थित सोमनाथ का मंदिर आदि। ये मंदिर भी चढ़ावे की दृष्टि से बड़े संपन्न हैं।हिंदू मंदिरों की ही तरह बौद्धमठों और गुरुद्वारों ंमें भी बड़ा चढ़ावा चढ़ता है।
गुरुद्वारे तो खासतौर पर इस मामले में बड़े संपन्न हैं। यह अलग बात है कि तमाम संपन्नता के बावजूद ये संपन्न मंदिरों की बराबरी कर पाने में असमर्थ हैं, लेकिन अमृतसर का स्वर्ण मंदिर और दिल्ली के तीन प्रमुख गुरुद्वारे रकाबगंज, बंगला साहिब और गुरुद्वारा शीशगंज भी चढ़ावे की दृष्टि से बड़े संपन्न गुरुद्वारे हैं। हालांकि इस्लाम में चढ़ावे का चलन नहीं हैं, इसलिए मस्जिद में चढ़ावे को स्वीकार करने की कोई व्यवस्था नहीं होती, लेकिन अपने को इस्लाम का ही एक हिस्सा मानी जाने वाली मजारों में बड़ी तादाद में हर हफ्ते चढ़ावा चढ़ता है। अजमेर शरीफ और पीराने कलियर देश में चढ़ावे के लिहाज से सबसे संपन्न मजारें हैं।
कुल मिलाकर हिंदुस्तान भले गरीब हो, यहां दुनिया के सबसे संपन्न मंदिरए गुरुद्वारे और मजारें हैं। कहा जा सकता है कि भारत वह गरीब देश है, जहां अमीर भगवान बसते हैं।भले ही सिद्धि विनायक हर दिन लाखों रुपये कीमत वाले मोदक से भोग पाते हों। भले वेंकटेश्वर भगवान बालाजी के लिए लाखों रुपये की कीमत वाला प्रसादम् तैयार होता हो और भगवान जगन्नाथ की रसोई में विशेष तौर पर रथयात्रा के दिनों में 1 लाख भक्तों का भोजन बनता हो। लेकिन इतनी भव्यता और इतने वैभवशाली देवताओं के देश भारत की जन हकीकत हाहाकारी है। विश्व खाद्य कार्यक्रम के मुताबिक दुनिया के आधे भूखे भारत में रहते हैं। हर 10 में से 6 हिंदुस्तानी जरूरी नागरिक सुविधाओं से वंचित हैं और गांवों में रहते हैं। जहां आज भी बहुत कुछ भगवान भरोसे ही है। जहां तक गरीबी का किस्सा है, वह तो हमारे भगवानों की ही तरह अपरंपार है। पिछले दो दशकों से तमाम दावों के बावजूद न तो गरीबी घटी है और न ही गरीबों का कोई एक आंकड़ा ही तय हो सका है। सरकार के अलग-अलग महकमों के मुताबिक देश में गरीबों का अलग-अलग प्रतिशत है। किसी के मुताबिक यह 34 फीसदी है, कोई 44 फीसदी तक आंकड़ा ले जाता है और किसी समिति के मुताबिक यह 26 फीसदी ही है।हालांकि भारत सरकार ने अर्थशास्त्री सुरेश तेंदुलकर की अध्यक्षता वाली समिति के जिस संशोधित आंकड़े को सही माना है वह 38 फीसदी के आसपास है। कहने का मतलब यह कि भारत सरकार अंतिम रूप से इस बात पर एकमत हो चुकी है कि गरीब 44 करोड़ लोग गरीबी रेखा के नीचे हैं। गरीबी रेखा जैसा शब्द शायद पूरी हकीकत को पूरी स्पष्टता से नहीं बताता। गरीबी रेखा से नीचे का मतलब है 5 लोगों का एक परिवार, जो 20 रुपये से भी कम में पूरे दिन गुजारा करता है। इस महंगाई में जहां 5 रुपये की चाय और 30 रुपये किलो दूध हो, उस महंगाई के दौर में क्या 5 लोगों का एक परिवार पूरे दिन महज 20 रुपये में गुजर-बसर कर सकता है? जाहिर है वह एक टाइम से ज्यादा समय भूखा रहता है।मंदिरों में भगवान का वास है और देश में इतने मंदिर हैं कि अगर प्रमुख मंदिर ही यह तय कर लें कि वह अपने पास मौजूद धन से दरिद्र नारायण की सेवा करेंगे तो देश में एक भी व्यक्ति भूखा सोने के लिए बाध्य नहीं होगा। भारत सरकार को अनिवार्य शिक्षा कानून लागू करने के लिए 30,000 करोड़ रुपये की दरकार है। अगर तिरुपति के बालाजी ही ठान लें तो किसी दूसरे मंदिर की सहायता की जरूरत भी नहीं पड़ेगी और सरकार का यह कार्यक्रम आसानी से पूरा हो जाएगा। देश के 100 धनी मंदिर और 36 उद्योगपति देश के लगभग 95 फीसदी जीडीपी के बराबर की संपत्ति के स्वामी हैं। माया मोह से छुटकारा दिलाने वाले भगवान और मंदिर अगर अपनी इस माया को मुक्त कर दें तो कोई भी हिंदुस्तानी भूखे सोने, बिना दवाई के मरने और बिना शिक्षा के नहीं रह सकता। लेकिन क्या माया मोह से दूर रहने की सीख देने वाले मंदिर और उनके स्वामी खुद माया मोह के बंधन से दूर होंगे?
(साभार दैनिक जागरण, राष्ट्रीय संस्करण)

रविवार, 4 जुलाई 2010

विकास पुरुष का यह कैसा दर्प?


शैलेश कुमार

विकास पुरुष की पदवी हासिल करने के बाद बिहार में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के तेवर कुछ ठीक नज़र नहीं आते. कुमार प्रदेश में फिलहाल जो कुछ भी कर रहे हैं वह किसी भी नजरिये से ठीक नहीं है. बड़ी मुश्किल से बिहार को लालू और राबड़ी के जंगल राज से मुक्ति मिली है. गत साढ़े चार वर्षों में प्रदेश ने वास्तव में नीतीश कुमार के नेतृत्व में तरक्की की है. किन्तु वर्तमान राजनीतिक घटनाक्रम केवल कुमार के लिए ही नहीं बल्कि प्रदेश की जनता के लिए भी नुकसानदायक साबित हो सकता है।

माना जा रहा है कि बिहार में गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी तथा भाजपा नेता वरुण गाँधी के प्रवेश करने से कुमार के जनता दल (यूनाइटेड) की धर्मनिरपेक्ष छवि को नुकसान पहुंचेगा. यही वजह है कि कुमार इन दोनों नेताओं को बिहार से दूर रखने की भरसक कोशिश कर रहे हैं. पर याद रहे, बिहार की जनता अब विकास की भाषा समझती है ना कि धर्म और जातिवाद की. पिछले विधान सभा चुनाव में उसने इस बात को सिद्ध करके भी दिखाया है. इसमें कोई दो राय नहीं कि जातिवाद और धर्म सम्बन्धी भ्रांतियां मिटने में अब भी कई दशक लग जायेंगे. लेकिन नीतीश कुमार का यह सोचना कि मोदी और गाँधी के बिहार आने से मुस्लिम मतदाता उनसे खफा हो जायेंगे, यह गलत है।

नरेन्द्र मोदी ने गुजरात में जो भी किया हो, उससे बिहार की जनता या फिर वहां के मुस्लिम कोई सरोकार नहीं रखते. यदि इस प्रकार की कोई भी बात लोगों के सामने आती है तो वह और कुछ नहीं बल्कि मीडिया द्वारा परोसा गया वह मसालेदार भोजन है जिसका मकसद केवल टीआरपी कमाना है. बिहार की जनता बेवकूफ नहीं है. उसने वर्तमान सरकार के विकास कार्यों को अपनी आँखों से देखा है. सूचना तकनीकी तथा शिक्षा के दौर से बाहर निकालकर वापस भैंस-बकरियों और गोबर के युग में लौटने का उनका कोई इरादा नहीं है. साफ़-सुथरे तरीके से मतदान कराया जाये तो जीत उसी राजनीतिक दल की होगी जिसका एकमात्र उद्देश्य प्रदेश और उसकी जनता का विकास करना है।

प्रदेश में जदयू और भाजपा के बीच एक अच्छा तालमेल रहा है और इस गठबंधन सरकार ने मिलकर राज्य में विकास को एक नया स्वरुप दिया है. दोनों दलों के रिश्तों में कडवाहट उन राजनीतिक दलों को एक बार फिर से लाभ पहुंचा सकती है जिन्होंने बिहार को पिछड़ेपन के गर्त में डुबोने और समूचे देश में बिहारियों को अपमानित कराने में कोई कसर नहीं छोड़ी. बिहार को अगले पांच वर्षों के लिए फिर से नीतीश कुमार जैसे मुख्यमंत्री तथा ऐसे ही सरकार की आवश्यकता है. बेकार के मसलों में पड़कर अपनी छवि बिगाड़ने तथा प्रदेश व पार्टी के दुश्मनों को मजबूत बनने का अवसर दिए बिना कुमार को चाहिए कि वे धर्म और जाति की राजनीति में फिलहाल न पड़कर विकास कार्यों पर केवल ध्यान दें. जनता झक मारकर उन्हें पुनः सत्ता में वापस लाएगी।

प्रदेश में विकास झलक रहा है लेकिन मंजिल अब भी बहुत दूर है. बिजली, पानी, बाढ़ और सूखा अब भी प्रदेश की ज्वलंत समस्याओं में से है तथा इनका समाधान निकालने के लिए घटिया राजनीति से परे एक कुशल सरकार की प्रदेश को जरुरत है. नीतीश इस बारे में सोचे और कदम उठायें. गुजरात सरकार द्वारा बाढ़ राहत के लिए दिए गए रकम को लौटने में कोई बुद्धिमानी नहीं है. पैसे वास्तव में अब तक लौटाए नहीं गए हैं. मीडिया ने इसे बढा-चढाकर पेश किया है।

बिहार केंद्र की उपेक्षा का शिकार है. सभी राजनीतिक दलों को इस समय राजनीति का अखाडा खेलने की बजाय एकजुट होकर केंद्र सरकार पर बिहार को मिलने वाले वांछित फंड तथा बिजली जैसी सुविधाएँ मुहैया कराने के लिए दवाब बनाना चाहिए. प्रगतिशील बिहार को कुशल नेतृत्व और विकासपरक योजनाओं की जरुरत है, जाति, धर्म, अलगाववाद व नक्सलवाद पर आधारित राजनीति की नहीं।

संपर्क: shaileshfeatures@gmail.com

रविवार, 13 जून 2010

दहकता लावा ह्रदय में है

शैलेश कुमार

कुछ दिनों पहले कुछ सामान खरीदने बाज़ार गया। वहां एक किराने के दुकान पर दुकानदार तथा ग्राहक के बीच चावल के दाम को लेकर बहस चल रही थी। ग्राहक दाम कम करने को बोल रहा था और दुकानदार था कि दाम न कम करने के पीछे की अपनी मजबूरी समझाने में लगा हुआ था। वैसे अब ये नज़ारे देश के हर हिस्से में हर रोज़ देखने को मिल रहे हैं। चावल, गेहूं, दाल, चीनी, टमाटर, हरा धनिया आदि के दाम आसमान छू रहे हैं। सरकार आनाज की पैदावार कम होने की दुहाई देकर मामले से पीछा छुड़ाने में लगी है। पर सच बात तो यह है कि फसलों की पैदावार अच्छी मात्रा में हुई है। कुछ दिनों पूर्व कर्नाटक में कृषि विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति प्रो बिस्लैया ने भी एक समारोह में यही बात कही। सच्चाई यह है कि देश में अनाज का बहुत बड़ा घोटाला चल रहा है, जिसका पर्दाफाश किये बिना मूल्य वृद्धि को नियंत्रित नहीं किया जा सकता।

कर्नाटक में गत एक वर्ष में चावल की कीमतों में जबरदस्त उछाल आया है। चावल की पैदावार के मामले में देश के सबसे बड़े राज्यों में से एक आंध्र प्रदेश में भी ऐसी ही स्थिति है। कुछ समय पहले १२ रूपये प्रति किलो के हिसाब से बिकने वाला चावल आज २८ से ३२ रूपये प्रति किलो के हिसाब से बिक रहा है। आंध्र प्रदेश से कर्नाटक, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, तमिलनाडु आदि राज्यों को चावल भेजा जाता है। लेकिन बंगलौर के एपीएम्सी यार्ड में मौजूद विश्वस्त सूत्रों के अनुसार आंध्र प्रदेश में सरकारी अधिकारियों के संरक्षण में चावल का बहुत बड़ा घोटाला हुआ है। खबर है कि प्रदेश से चावल बड़ी मात्रा में अनुचित रूप से सिंगापूर, मालदीव, मारीशस, थाईलैंड व श्रीलंका आदि देशों में भेजा जा रहा है। यहाँ यही चावल १२० से १४० रूपये प्रति किलो के हिसाब से बेचा जा रहा है। चावल की इस कालाबाजारी से अपराधियों को बड़ा फ़ायदा मिल रहा है। लेकिन इसका खामियाजा भारत की आम जनता भुगत रही है जिसे दुगुने मूल्य में चावल खरीदने को मजबूर होना पड़ा है। इस दशा में उच्च वर्ग और निम्न वर्ग के लोगों का काम चल जा रहा है। उच्च वर्ग के लोगों के पास इतना पैसा है कि वे बढ़ी हुई कीमतों में भी चावल खरीद लें। अति निम्न वर्ग के लोग भीख मांग के भी काम चला लेते हैं। लेकिन माध्यम वर्ग का क्या जो किसी के सामने हाथ फैलाने में भी हिचकिचाता है?

गुजरात व उत्तर प्रदेश में चीनी को गोदामों में भरकर रखने के कई मामले प्रकाश में आये हैं। जाहिर है कि ऐसे में दाम बढ़ेंगे और इस दौरान असामाजिक तत्व इसे ऊँचे दामों में बेचकर भारी मुनाफा कमाएंगे। सलाद तो जैसे थाली से गायब ही हो गया है। हरा धनिया की कीमत करीब ३०० गुना बढ़ गयी है। टमाटर पहुँच से बाहर है। दाल और तेल भी आम आदमी की पहुँच से बाहर जाता दिख रहा है। ऐसे में आम आदमी करे तो क्या करे? जिस सरकार को उसने चुनकर देश के माई-बाप के पद पर बैठाया है, वही उनका दुश्मन बन गयी है। सत्ता बचाने के लालच और अपना उल्लू सीधा करने की जुगाड़ में जन प्रतिनिधि कानो में रुई डालकर तथा आँखों पर पट्टी बांधकर बैठे हैं।

इन्हें क्या? सरकारी खर्चे पर फाईव स्टार होटलों में जाकर रहते हैं। मुफ्त की रोटी तोड़ते हैं। विमानों में उड़ते हैं। और घोटाले करके पैसा बनाते हैं। पर उस आम जनता का क्या, जो एक वक़्त के खाने के लिए भी तरस कर रह जाती है। राशन की दुकानों में घंटों लाइन में लगी रहती है। इस पर भी उसे कई दिनों तक राशन के लिए दौड़ाया जाता है। पानी के लिए वे रात के दो-तीन बजे तक जागते हैं, और रोड पर लाइन लगाते हैं। रौशनी नहीं रहती है तो मोमबत्ती जलाकर काम करते हैं। जब विरोध प्रदर्शन करते हैं तब भी लाठी और गोली बरसाकर शांत कर दिए जाते हैं। कभी-कभी तो मन में यही सवाल आता है कि क्या ये प्रजातंत्र केवल उनके लिए है जो आर्थिक रूप से समृद्ध हैं?

मत भूलिए की आम आदमी कोई कागज़ का टुकड़ा नहीं जिसे जब चाहे फूंक मारकर गायब कर दिया जाये और जब चाहे मसल दिया जाये। बल्कि आम आदमी वह ताकत है जो एक बार संगठित होकर खड़ा हो जाये तो बड़े से बड़े पहाड़ भी उनके चरणों में नतमस्तक हो जाये। तो फिर ये जनता के नौकर क्या चीज़ हैं?

तुम हमारी चोटियों की बर्फ को यों मत कुरेदो
दहकता लावा ह्रदय में है, जलाकर ख़ाक कर देंगे॥

मंगलवार, 18 मई 2010

www.blogvani.com

हत्या नहीं, वध करें

शैलेश कुमार

मुझे आज भी वो रात याद है। हर दिन की तरह मैं ऑफिस से करीब रात १० बजे लौटा था और आते के साथ ही मैंने टीवी ट्यूनर कार्ड से चलने वाली टीवी को ऑन किया था। न्यूज़ चैनल लगाने के साथ ही मोटी-मोटी लाल रंग की हेडलाइन्स ने बरबस मुझे सब कुछ भुलाकर लगातार टीवी से चिपक जाने को मजबूर कर दिया। चैनल पर लगातार खबर आ रही थी कि आतंकवादियों ने देश की आर्थिक राजधानी मुंबई पर अब तक का सबसे बड़ा हमला बोला है।
पहले तो विश्वास ही नहीं हुआ कि आतंकवादी देश के सुरक्षा घेरे को भेदकर इतना बड़ा हमला भी कर सकते हैं। पर अगले ही पल टीवी पर प्रसारित होते दृश्यों को देखकर तथा यह सोचकर कि देश में देशद्रोहियों की कमी नहीं है, मुझे यकीन हो गया कि इस बार हमला भारत को तोड़ने के उद्देश्य से किया गया है। उसे यह बताने के लिए किया गया है कि तुम्हारी अरबों की जनसंख्या की ज़िंदगी को नरक बनाने के लिए हम कुछ हज़ार आतंकवादी ही काफी हैं। मुझे विश्वास हो गया कि यह हमला इसलिए किया गया है कि हमारी सुरक्षा एजेंसियों को बताया जा सके कि वे कितने सचेत हैं और अपने दायित्वों का निर्वाह कितनी गंभीरता से कर रहे हैं। समझ गया मैं कि यह हमला केवल सैकड़ों लोगों का खून बहाने के लिए नहीं किया गया था, बल्कि इसका मकसद उन करोड़ों लोगों के अभिमान को तोडना था कि केवल "सारे जहाँ से अच्छा, हिंदुस्तान हमारा" गाकर और देश की विशालता की शेखी बघार कर वे अपने मुल्क को सभी विध्वंशकारी ताकतों से सुरक्षित रख पाएंगे।

चलो जो बीत गयी, सो बात गयी। लेकिन दिलों में घर कर गयी अपनों को खोने की वह कसक कैसे जाएगी सो कुछ गिने-चुने आतंकवादी उस २६ नवम्बर की रात को दे गए? उस परिवार का क्या जिसके घर में कमाने वाला एक सदस्य भी जीवित न रहा? उन बच्चों का जिन्होंने होश सँभालने से पहले ही अपने माँ या बाप या फिर दोनों को खो दिया? मोमबत्तियां तो अब मुंबई हमले की हर बरसी पर जलेंगी। अख़बारों के लेख, नेताओं के भाषण में मरने वालों का जिक्र हर २६ नवम्बर को किया जायेगा। लेकिन उन सैकड़ों परिवारों के लिए २००८ का वह २६ नवम्बर फिर से आ पायेगा क्या, जिस २६ नवम्बर की सुबह उनके अपने उन्हें यह भरोसा देकर घर से निकले थे कि ढलती शाम के साथ वे एक बार फिर मिलेंगे? खैर वो २६ नवम्बर तो फिर से आने को रहा, पर अब वर्ष के हर दिन को वो २६ नवम्बर बनने से रोका जा सकता है, जो सबके लिए तो नहीं, लेकिन बहुतों के लिए प्रलय बनकर आया। लेकिन ऐसा सरकार के चाहने से नहीं, हमारे चाहने से होगा क्योंकि तो कभी ऐसा चाहेगी ही नहीं।

यदि सरकार चाहती ही होती तो अब तक अफज़ल गुरु को फंसी हो चुकी होती। यदि आतंकवादियों को फंसी दे दी गयी होती तो कंधार की घटना न घटती। इसमें कोई शक नहीं अजमल कसाब को फंसी की सजा मिलने के बाद भी वह वर्षों तक जिंदा रह जाये। एक बार फिर से कंधार जैसी घटना घटे और हमारे दुश्मन उसे आज़ाद करा ले जाएँ।

मुझे तो इस बात पर बड़ा आश्चर्य हुआ जब कुछ लोगों ने कसाब को फंसी की सजा न देकर उम्रकैद की सजा दिए जाने की वकालत की। ऐसे लोगों को मैं बता दूँ कि कसाब वैसे लोगों में से नहीं है जो वक़्त के साथ सुधर जाये। वह तो एक ऐसा राक्षस बन चूका है जो इंसानों को खाता है, उनका खून बहाकर ठहाका मारकर हँसता है और उसका वश चले तो उसे भी मार खाए जो उसे खाने को देता है। वास्तव में फंसी की नौबत तो आनी ही नहीं चाहिए थी। याद रहे राक्षसों की हत्या नहीं की जाती, उनका तो वध किया जाता है। जैसे राम ने रावण का वध किया था। वैसे ही कसाब का भी वध किया जाना जरुरी था।

दोस्तों, सब कुछ साफ़ है। दूध का दूध और पानी का पानी हो गया है। इसमें कोई गुंजाईश नहीं कि कसाब एक राक्षस बन गया है। फिर उसकी फंसी में इतना विलम्ब क्यों? क्यों हमारी व्यवस्था उसे लटकाने के लिए एक वर्ष का समय चाहती है? और इसका क्या भरोसा है कि वह एक वर्ष २० वर्षों में न बदल जाये? आरक्षण, अपने हक़, नेताओं की गिरफ्तारी आदि मुद्दों पर तो हम अक्सर सड़कों पर उतर आते हैं, बस जलाते हैं, सार्वजानिक संपत्ति को नुक्सान पहुंचाते हैं। कहने का तात्पर्य है कि सरकार को हिलाकर रख देते हैं। फिर कसाब के मामले में चुप्पी क्यों? क्यों शांत बैठे हैं हम? मत करो हिंसा, अहिंसात्मक तरीकों से सरकार पर दबाव बनायें। जरुरत पड़े तो कुछ भी करें क्योंकि आज की सरकार थोड़ी बहरी है। उसे ऊँचा सुनने की आदत है। उनके लिए धमाके की जरुरत है।

इससे पहले कि देश एक बार फिर से दहले और फिर से कंधार की पुनरावृत्ति हो, इस राक्षस का वध किया जाना जरुरी है। यदि यह दानव फिर भी बच जाता है तो सही में हमसे महान और कोई नहीं होगा। वही राग अलापते रहेंगे "सारे जहाँ से अच्छा, हिंदुस्तान हमारा"। लेकिन धीरे-धीरे एक दिन इस हिन्दुस्तान को ही खो देंगे, और फिर भी रट्टू तोतों की तरह गाते रह जायेंगे - "सारे जहाँ से अच्छा, हिंदुस्तान हमारा..."

सोमवार, 22 मार्च 2010

जहाँ चाह, वहां राह


शैलेश कुमार

कई बार हम ज़िन्दगी को अपने इशारे पर नचाते हैं और कई बार ज़िन्दगी हमें अपने इशारे पर नचा लेती है. और जब ज़िन्दगी के इशारे पर हम नाचते हैं तो खुद पर वश नहीं होता. बस नाचते जाते हैं, नाचते जाते हैं.

बंगलोर से दिल्ली जाकर मैंने भी ज़िन्दगी को अपने इशारे पर खूब नचाया. दिन-रात एक करके जो चाहा, वही किया. लेकिन ज़िन्दगी ने आख़िरकार अपना रंग दिखाया और कहा कि चल बहुत नचा लिया तूने मुझे, अब तेरी बारी है. वही हुआ. अचानक दिल्ली छोड़ बंगलोर वापस जाने की योजना बनी और आज करीब डेढ़ माह के बाद मुझे थोड़ी फुर्सत मिली है कि मैं अपना ब्लॉग लिख सकूँ.

बंगलोर वापस आकर फिर से अपना काम शुरू करना आसान नहीं रहा. कुछ लोग तो मेरे आने से फूले नहीं समां रहे थे लेकिन कुछ ऐसे भी थे जिन्हें मुझे वापस देखकर जबरदस्त झटका लगा. पर शायद यह मेरी सकारात्मक सोच का ही नतीजा है कि मैंने सब कुछ हल्के में लिया और इस उम्मीद के साथ फिर से अपना काम शुरू किया कि सब कुछ मेरे मिशन जर्नलिज्म का हिस्सा है.

आज करीब एक महीने होने को आये. शुरूआती कुछ दिनों के परिश्रम के बाद फल मिलने लगा है, पर उन दिनों को याद कर शरीर में सिहरन सी दौड़ जाती है. रास्ते अभी भी आसान नहीं है, लेकिन उसे आसान बनाना है. और वो आसान बनेगा केवल सकारात्मक सोच और सतत परिश्रम से.

सुबह घर से निकलते वक़्त मालूम नहीं होता कि आज की मंजिल कहाँ है? बस मिलेगी या नहीं, अगर मिलेगी तो कब मिलेगी और कितनी देर में मिलेगी? बस में बैठने को जगह मिली तो ठीक है, नहीं तो खड़े-खड़े ही मंजिल तक जाना है. बस बदलनी पड़ी तो दौड़ कर दूसरे बस में भी चढ़ना है. भोजन का कोई समय और ठिकाना मालूम नहीं. जहाँ मिले फुर्सत के कुछ क्षण वहीं कर ली पेट पूजा. और चल पड़े अगली मंजिल की ओर.

रात में जब नौ बजे के आसपास ऑफिस से निकलो तो सबसे बड़ी चिंता बस को लेकर होती है. पता होता है कि दो-ढाई घंटे से पहले घर नहीं पहुचुंगा पर दिल को तसल्ली देता रहता हूँ कि बस बदल-बदल के बहुत जल्दी पहुँच जाऊंगा. खुद को दी गई यही तसल्ली बहुत ताकत देती है. मोबाइल पर दोस्तों से एसएम्एस करते और बाहर के दृश्यों को निहारते वक़्त कट जाता है. देर रात घर पहुंचकर एक ख़ुशी होती है कि दिन अच्छा रहा, काम अच्छा हुआ.

उच्च शिक्षा पर मुझे रिपोर्टिंग करनी होती है. आजकल विश्वविद्यालय आना-जाना चल रहा है. हर रोज़ विश्वविद्यालय के जंगलों के बीच के सुनसान रास्ते से मीलों पैदल चलता हूँ कड़ी धूप में. मन और शरीर जवाब देने लगता है. लेकिन जैसे ही मिशन जर्नलिज्म का लक्ष्य दिमाग आता है, सब कुछ आसान बन जाता है.

आजकल दोस्तों से बात करने के लिए ज्यादा वक़्त नहीं निकल पाता. इन्टरनेट पर चैट नहीं कर पाता. वे शिकायत करते हैं, पर मजबूरी है. पहले साप्ताहिक अवकाश बुद्धवार हुआ करता था. अब इतवार हो गया है. ऐसे में इतवार के आने का इंतज़ार रहता है कि कुछ समय अनाथाश्रम जाकर बच्चों के साथ गुजारूं. मुझे नहीं लगता कि मैंने कभी उनकी कोई खास मदद की है, पर उनसे एक अटूट रिश्ता जुड़ गया है.

अभी तक ज़िन्दगी के इशारे को नहीं समझ पाया हूँ. बस उसके इशारों पर नाच रहा हूँ. अपना काम कर रहा हूँ. भावना, स्नेह, प्रेम, ईर्ष्या, दोस्ती-यारी, सबको एक ताक पर रखकर सिर्फ काम में लगा हूँ इस उम्मीद के साथ कि मिशन जनालिज्म का लक्ष्य पूरा होगा. इसके माध्यम से उन्हें इन्साफ मिलेगा जो इसके लिए तरस गए हैं.

पिछले एक माह के कार्यकाल के दौडान कुछ लोगों को मेरे प्रकाशित लेख से इन्साफ मिला है, मुझे ख़ुशी है उनकी, पर ये बहुत छोटी सी सफलता है, जिसे वृहद् रूप देना है. रास्ते कभी आसान नहीं होते, पर दिल को तसल्ली देकर और खुद पर विश्वास करके सब कुछ हासिल किया जा सकता है.

वक़्त आ गया है कि ज़िन्दगी को एक बार फिर से अपने इशारे पर नचाऊं. हर बड़े काम की शुरुआत छोटे से ही होती है. और लोगों ने तो अकेले ही कितने सारे मुकाम प्राप्त किये हैं. मेरे साथ तो फिर भी बहुत से लोग हैं. धन्यवाद करता हूँ मैं हर उन लोगों का जिन्होंने अब तक मेरा साथ दिया है, मुझे प्रोत्साहित किया है और जिनसे मुझे बहुत कुछ सीखने को मिला है. साथ ही मैं उन लोगों का भी धन्यवाद करता हूँ जिन्होंने मेरा पैर खीचने की कोशिश की है. उन्होंने मुझे जितना पीछे खीचा है, उतना ही दम लगाकर मैंने आगे बढ़ने की कोशिश की है.

मंजिल तब दूर होती है जब वो हमारी आँखों से ओझिल हो जाती है. पर जब वो साफ दिखती रहे तो उसे पाने से कोई नहीं रोक सकता क्योंकि उसे देखकर हम अपना रास्ता लगातार तैयार करते रहते हैं. शायद अभी और भी मेहनत की दरकार है. और इसके लिए खुद को तैयार करना होगा. ज़िन्दगी को अपने इशारे पर फिर से नचाना होगा....

मंजिल मिलै या न मिलै इसका गम नहीं
मंजिल की जुस्तजू में मेरा कारवां तो है.

बुधवार, 30 दिसंबर 2009

www.blogvani.com

क्या, तोड़ दें देश को?



शैलेश कुमार

देश का बंदरबांट का अभियान शुरू हो गया है. तेलंगाना के लोगों ने बाज़ी मार ली है. आप क्यों पीछे हैं? रोटी, कपडा और मकान से पहले तो आपको भी अपना एक अलग राज्य, एक अलग राष्ट्र ही चाहिए ना? आइये, रजिस्ट्रेशन शुरू हो गया है. लाइन में आईयेगा, कम-से-कम यहाँ तो थोड़ा धीरज दिखाइए.

ठीक 40 साल पहले 1969 में लगभग चार सौ लोग अलग तेलंगाना राज्य का सपना दिलों में दबाये ही इस दुनिया से विदा हो गए. माफ़ कीजियेगा, विदा हो गए नहीं, विदा कर दिए गए. इन चालीस सालों में तेलंगाना आन्दोलन तो खैर चलता ही रहा, पर इस पर राजनीतिक रंग भी बड़ा तेजी से चढ़ा. इसी का नतीजा था कि जो तेलंगाना राज्य सैकड़ों लोगों के बलिदान के बाद भी न बन सका, उसे बनाने का फैसला केंद्र सरकार ने 9 दिसंबर 2009 को शाम 7 बजे से रात 11 बजे के बीच चार घंटे में ही ले लिया. दनादन संवाददाता सम्मलेन बुलाकर गृह मंत्री पी. चिदंबरम ने घोषणा कर डाली कि अलग तेलंगाना राज्य के लिए आंध्र प्रदेश विधान सभा में प्रस्ताव लाया जायेगा.

बड़े ताज्जुब की बात थी कि आखिर विधान सभा में कांग्रेस इस प्रस्ताव को पारित करवाएगी कैसे? विरोध के स्वर उभरने की पूरी गुंजाइश थी और हुआ भी वही, जिसकी आशंका व्यक्त की जा रही थी. पहले तेलंगाना के समर्थन में हंगामा मचा था, अब विरोध में मचा. और जब फिर से गृह मंत्री का बयान आया कि फ़िलहाल कोई नया राज्य नहीं बनेगा और सर्वदलीय बैठक में फैसला लिया जायेगा तो एक बार फिर से आन्दोलन भड़क उठा कि सरकार अपने वायदे के खिलाफ जा रही है.

देखा जाये तो देश में 1953 की स्थिति एक बार फिर से बनती नज़र आ रही है. गौरतलब है कि 56 साल पहले मद्रास में अलग आन्ध्र प्रदेश राज्य बनाने की मांग को लेकर 58 दिन की भूख हड़ताल पर बैठे पोट्टी श्रीरामुलू की मौत हो गयी थी. तब जाकर नेहरु सरकार ने घुटने टेक दिए और देश में पहली बार भाषा के आधार पर राज्य बनाने की स्वीकृति देकर सरकार ने आन्ध्र प्रदेश राज्य का गठन कर दिया. इसी का नतीजा था कि राज्य पुनर्गठन आयोग की स्थापना हुई और देश में पहली बार भाषा के आधार पर राज्यों के गठन को मंजूरी दे दी गयी.

1953 के हालात फिर से ना पनपने पाए, यह सोचकर केंद्र की कांग्रेस सरकार ने टीआरएस (तेलंगाना राष्ट्र समिति) प्रमुख के. चंद्रशेखर राव के 11 दिनों के आमरण अनशन के सामने झुककर पृथक तेलंगाना राज्य बनाने की 9 दिसंबर की अर्धरात्रि को घोषणा तो कर दी, पर ये न सोचा कि उसके नतीजे क्या होंगे. परिणाम सामने है. इधर सरकार ने घोषणा की नहीं कि गोरखालैंड के लिए लोग आमरण अनशन पर बैठ गए. पिछले एक दशक से सोये नेता जाग गए और देखते- ही-देखते पूर्वांचल, हरित प्रदेश, विदर्भ, बुंदेलखंड सहित 11 नए राज्यों की मांगे सामने आ गयीं. अपने पुतले बनवाकर अमर बनने का ख्वाब टुटा तो उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती ने भी पत्ता फ़ेंक दिया और प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर उत्तर प्रदेश के तीन टुकड़े करवाने पर तुल गयीं. भाजपा से निकले गए जसवंत सिंह को लगा ही था कि उनका राजनीतिक जीवन भी अब उनके बुढ़ापे के साथ बुढ़ापे का शिकार होने जा रहा है, उनके हाथ फिर से गोरखालैंड का मुद्दा लग गया. अजित सिंह जो इतने दिनों तक पाता नहीं कहाँ दुबके हुए थे, अचानक हरित प्रदेश के लिए अपना हिस्सा मांगने बिल से निकल आये.

हालाँकि असमंजस की स्थिति अभी भी बरक़रार है. पृथक तेलंगाना राज्य के गठन में भी बहुत सारी अडचनें हैं. भोगौलिक दृष्टि से हैदराबाद तेलंगाना में आता है. पर याद रहे कि हैदराबाद आंध्र प्रदेश का चेहरा है, जिस पर राज्य सरकार ने न जाने कितना कुछ लुटाया है. ऐसे में फिर वही स्थिति हो जाएगी जो 1953 पोट्टी श्रीरामुलू के साथ हुआ था. आंध्र प्रदेश तो बन गया, पर मद्रास नहीं मिला. यहाँ भी कहीं वैसा ही न हो जाये. चंद्रशेखर राव के हाथ में तेलंगाना तो आ जाये, पर शायद हैदराबाद न आने पाए.

खैर तेलंगाना या अन्य राज्यों के गठन के मुद्दे पर हम बात ही क्यों करें. क्यों देश को तोड़ने की सोचे? सही मायनों में देखा जाये तो राज्यों के गठन का मामला वास्तव में राज्यों के गठन का नहीं रहा है. यह मुद्दा राजनीतिक महत्वाकान्क्षाओं, राजनीतिक और व्यक्तिगत स्वार्थों का बन गया है. सबको अपना-अपना हिस्सा चाहिए. एक दिन देश का हरेक नागरिक सड़क पर होगा, अपने हिस्से के लिए. रोटी, कपडा, मकान और नौकरी से पहले उनकी मांग होगी अपने लिए एक अलग देश, एक अलग राज्य की.

बात में दम है. एक राज्य के लिए करोड़ों लोग सड़क पर उतर आये हैं. हो-हल्ला मचा रहे हैं, मार-काट तक को तैयार हैं. लेकिन महंगाई को लेकर कोई बवाल नहीं है. सरकारी स्कूलों में मास्टर नहीं आते, उसे लेकर क्रोध नहीं है. हर रोज़ महिलाओं के साथ छेड़खानी होती है, गाँव-गाँव में बलात्कार होते हैं, उसे लेकर कोई आवाज़ उठाने वाला नहीं है. किसान आत्महत्या कर रहे हैं, उसे ले कर कोई बोलने वाला नहीं है. नौकरी के लिए पढ़े-लिखे लोग तरस रहे हैं, पर सरकार से कोई पूछने वाला नहीं है. लेकिन राज्य न मिला तो जान देने और लेने को भी तैयार है. सलाम है जनता की इस सोच को.

तोड़ डालो देश को. जी हाँ, देश का टूटना जरुरी है. जितने टुकड़े होंगे, उतनी आसानी से शासन चल पायेगा. कानून-व्यवस्था बनाये रखने में मदद मिलेगी. वैसे भी हमारे राज्य बहुत बड़े-बड़े हैं. मध्य प्रदेश में यूरोप के कम-से-कम 12-13 देश समां जाएँ. कुछ ऐसा ही महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश और कर्नाटक आदि के भी साथ है.

राज्य पुनर्गठन आयोग का फिर से नए सिरे से गठन किया जाना चाहिए. पर इस बार बंटवारे का आधार भाषा या संप्रदाय न हो. इससे केवल राजनेताओं के स्वार्थ की पूर्ति हो पायेगी. यह विकास नहीं, बर्बादी का आधार होगा. बंटवारा होना चाहिए लोगों की जरूरतों को ध्यान में रखकर, यह देखकर कि उस बंटवारे उस क्षेत्र का विकास कितनी तेजी से हो सकता है. तब जाकर राज्यों के बंटवारे की समस्या भी सुलझेगी और सही मायने में विकास का चक्र भी चल पायेगा.

विकास की जो गति टेक्नोलोजी और संचार के क्षेत्र में देखी जा रही है, उसी रफ़्तार में विकास लोगों की सोंच में भी दिखना जरुरी है. तभी सरकार ने जितनी तत्परता राज्यों के गठन जैसे मुद्दों में दिखाई है, वही तत्परता विकास के मसलों में भी नज़र आएगी.

तो फिर क्या राय है आपकी? तोड़ दिया जाये देश को.....???

संपर्क: shaileshfeatures@gmail.com