शुक्रवार, 17 अक्तूबर 2008

शुरू हुई महासंग्राम की उलटी गिनती

शैलेश कुमार

भाजपा और कांग्रेस के बीच एक जबरदस्त चुनावी मुकाबले की घड़ी अब नज़दीक आ गई है। जहाँ कांग्रेस पर महँगी और आतंकवाद और जैसे मुद्दों पर गाज गिरने वाली है वहीं भाजपा एक बार पुनः अपने धर्मनिरपेक्ष स्वरुप को लेकर सवालों के घेरे में आ खड़ी हुई है।

निर्वाचन आयोग के द्वारा पाँच राज्यों में चुनाव की तिथियों की घोषणा करने के बाद अब राजनीतिक सरगर्मियां बढ़ गई हैं। इन चुनावों में अब एक महीने से भी कम का वक़्त रह गया है।

जहाँ केन्द्र में सत्तारूढ़ कांग्रेस पार्टी पुनः पाँच वर्षों के लिए सत्ता में आने की पुरजोर कोशिश में लगी है वहीं मुख्य विपक्षी भारतीय जनता पार्टी कांग्रेस को चारो खाने चित कर इस बार सत्ता में वापसी के लिये जी-जान लगाती नज़र आ रही है।

राजनीतिक दलों के पास इस बार चुनाव में भुनाने के लिए ऐसे कई गरमा-गरम मुद्दे मौजूद हैं जिनका अगर सही से इस्तेमाल किया गया तो वे चुनाव के परिणामों में भरी उलट-फेर कर सकते हैं।

बीते कुछ समय में जिस प्रकार से अंतराष्ट्रीय बाज़ार लुढ़का है उसने भारतीय आर्थव्यवस्था की कमर तोड़कर रख दी है। भारतीयों बाज़ारों का बुरा हाल है और इसकी प्रगति पर एक लगाम सा कस गया है।

मुद्रास्फीति की दरों में लगातार वृद्धि और बढती महंगाई के इस दौर में त्याहारों की चमक कहीं खो सी गई है। और-तो-और, सामान्य घरेलू उत्पादों जैसे सब्जी, तेल, गैस और राशन की आसमान छूती कीमतों ने आम आदमी का जीना दूभर कर दिया है। ऐसे में आगामी विधान सभा चुनावों में अगर जनता का गुस्सा सत्तारूढ़ दलों पर टूट कड़े तो इसमे कोई चौकाने वाली बात नही है।

भले ही मौजूदा कांग्रेसी सरकार ने परमाणु मुद्दे पर तटस्था दिखाते हुए इसमे विजय प्राप्त की हो लेकिन कांग्रेस को इससे अगले महीने पाँच राज्यों में होने वाले विधान सभा चुनावों में कोई खास लाभ नही मिलने वाला है। अभी भी भारत की जनता के लिए परमाणु उर्जा से ज्यादा मायने रखती है दो वक्त की रोटी। जिस देश में आज भी तकरीबन चालीस प्रतिशत जनसँख्या गरीबी रेखा से नीचे की जिंदगी गुजर-बसर कर रही है और लगभग इतनी ही निरक्षर है, उसे परमाणु उर्जा का महत्व भला क्या समझ में आएगा, यह सचमुच में एक विचारनीय प्रश्न है।

पिछले कुछ महीनो में आंतकवाद की बढती घटनाओं और लगातार हो रहे धमाकों की वजह से हुए जान-माल के नुकसान से लोगों के अंदर और सरकार के प्रति भारी गुस्सा है। लोकसभा चुनाव-२००४ के दौरान आंतकवाद के मुद्दे पर राजग सरकार को आदे हाथों लेने वाली संप्रंग सरकार की इश्थी आज उससे भी कही ज्यादा डावांडोल नज़र आ रही है। प्रधानमंत्री जहाँ एक ओर महंगाई के मुद्दे पर विपक्ष और अपने ही गठबंधन के घटक दलों के द्वारा लगातार की जा रही आलोचनाओं से अलग-थलग पड़ गए हैं वही दूसरी ओर आंतकवाद ने भी उनकी नाक में दम कर रखा है।

राष्ट्रीय एकता परिषद् की बैठक में भी भाजपा शासित राज्यों के मुख्यमंत्रियों ने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह पर आंतकवाद के ख़िलाफ़ नरम रवैया अपनाने का आरोप लगाते हुए आंतकवाद पर नियंत्रण के लिए पोता जैसे सख्त कानून को बहल करने की अपनी मांग दोहराई।

गौरतलब है की परमाणु मुद्दे पर कांग्रेस के साथ आई समाजवादी पार्टी सुप्रीमो मुलायम सिंह एक बार फिर कांग्रेस से दूर जाते दिखायी पड़ रहे हैं। पार्टी के नेता अमर सिंह ने अभी हाल में घटित जामिया एनकाउंटर को फर्जी बताकर आंतकवाद मुद्दे पर सरकार को कठघरे में ला खड़ा किया है। साथ ही मुस्लिम समुदाय एनकाउंटर की बात को पचा नही पा रह है। इस घटना के बाद सरकार और मीडिया ने इस समुदाय के प्रति जो रवैया अपनाया है उससे वे कहीं ज्यादा आहत हुए हैं और उससे फूटने वाला रोष आने वाले चुनावों में कांग्रेस को पिछले पांवदान पर धकेल दे तो उसमे कोई आश्चर्य वाली बात नही होगी।

भाजपा शायद इस प्रकार की अनुकूल परिस्थितियों को पा कर खुश हो सकती है किंतु उसके लिए भी रास्ता उतना साफ़ नही है जितना की यह नज़र आता है। भाजपा शासित राज्यों उड़ीसा व कर्णाटक में अल्पसंख्यकों पर हमले के बाद पार्टी की छवि को थोड़ा ठेस अवश्य पंहुचा है। केन्द्र के द्वारा राज्य में धारा ३५६ लगाने की धमकी से सरकार के विरुद्ध उपज रही असंतोष की भावना को और भी बल मिला है।

राजस्थान में वसुंधरा राजे को अपनी ही पार्टी के कुछ लोगों से खतरा हो सकता है। ऐसा माना जाता है की भाजपा के शीर्ष नेताओं में गिने जाने वाले जसवंत सिंह की श्रीमती राजे से कुछ जमती नही है। बीते वर्ष जसवंत सिंह की पत्नी ने भाजपा द्वारा वसुंधरा राजे को माँ दुर्गा के रूप में पोस्टर में चित्रित किए जाने को लेकर उनके खिलाफ अदालत में मुकदमा दायर कर इस दावे को और भी पुख्ता बना दिया था।

मध्य प्रदेश में भी भाजपा के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान बिजली, पानी और सुखा जैसी समस्याओं को लेकर विपक्षी पार्टी कांग्रेस द्वारा आलोचनाओं के घेरे में हैं। राज्य सरकार ने अपने कार्यकाल के दौरान यूँ तो कई विकास योजनाओं को हरी झंडी दिखाई है लेकिन मध्य प्रदेश की जनता इसे पार्यप्त नही मानती। प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह और नए युवा नेताओं के नेतृत्व में यहाँ कांग्रेस कुछ नया कर दिखने को लालायित है।

दिल्ली वासियों की पसंदीदा मुख्यमंत्री कहलाने वाली शीला दीक्षित की गद्दी भी इस बार हिलती नज़र आ रही है। शहर में ब्लू लाइन बसों को नियंत्रित करने में असफल और महिलाओं की सुरक्षा करने में विफल कांग्रेसी सरकार के सर पर पराजय की तलवार लटकती नज़र आ रही है।` शहर में लगातार बढ़ रही आंतकी गतिविधियों ने विपक्षी भाजपा को एक और मुद्दा दे दिया है।

मुद्दे तो बहुत हैं और इन मुद्दों की बुनियाद पर इस बार चुनावी राजनीती में बड़े परिवर्तन दिखने के आसार बल पकड़ते दिखाई पड़ रहे हैं। अब किसकी होगी विदाई और किसका होगा अभिनन्दन, यह तो आने वाले अगले दो महीनो में ही साफ़ हो पायेगा। पर एक चीज़ तो तै है की इस बार इन पाँच राज्यों के विधान सभा चुनावों में भारी टक्कर दिखने की उम्मीद है।

1 टिप्पणी:

गिरीन्द्र नाथ झा ने कहा…

हिंदी ब्लॉग दुनिया में आपका स्वागत है...अच्छी राजनीत संबधी पोस्ट के लिए शुक्रिया