बुधवार, 4 नवंबर 2009

मुर्दों की सुरक्षा?


शैले
कुमार

अनिल कपूर की फिल्म नायक के उस सीन जिसमे राजनीतिक आन्दोलन से उपजे भयानक जाम की वजह से अस्पताल पहुँच पाने के कारण अम्बुलेंस में एक मरीज को दम तोड़ते दिखाया गया है, की यादें तीन नवम्बर 2009 को उस समय तारोताज़ा हो गयीं, जब चंडीगढ़ में प्रधानमंत्री का काफिला गुजरने से पहले रोके गए ट्रैफिक की वजह से जन्मे जाम में फंसकर सही समय पर अस्पताल पहुँच पाने की वजह से एक मरीज ने अमुब्लेंस में ही दम तोड़ दिया. प्रधानमंत्री कार्यालय ने एक विज्ञप्ति जारी कर घटना पर अफ़सोस तो जता दिया, पर क्या अफ़सोस जताने से उस इंसान की जा उसे वापस मिल जायेगी? क्या उस परिवार को अपना खोया बेटा, अपना भाई वापस मिल जायेगा? भले ही यह एक छोटी सी घटना रही हो, पर आम आदमी के लिए यह एक बहुत बड़ा मसला है और इस पर सोचने-विचारने और कुछ ठोस कदम उठाने की बड़ी जरुरत है.

देश के कुछ बड़े शहर और राजधानियां जो की राजनीति का अड्डा बन चुके हैं, उन शहरों में नेताओं की वजह से पैदा हुए जाम की वजह से आये दिन लोगों के चेहरे पर उभरते तरह-तरह के अफ़सोस, गुस्सा और अन्य भावों को आसानी से देखा जा सकता है. पिछले वर्ष बंगलोर में जनता दल (धर्मनिरपेक्ष) की एक रैली के दौरान ऐसा जाम लगा था जिसकी कल्पना शायद मैंने कभी सपने में भी नहीं की थी. आपकी जानकारी के लिए बता दूँ कि ये जाम लगभग 10 घंटे तक था. इस दौरान वहां से एक भी गाड़ी टस से मस भी नहीं हुई थी. स्कूल से लौटने वाले बच्चे रात में 10-11 बजे किसी तरह से अपने घर पहुंचे थे. जाने कितने ही लोगों की ट्रेन और जहाज छूट गए. पता नहीं कितने ही मरीजों की हालत बिगड़ गयी. और कितनी बड़ी तादाद में प्रदूषण में इजाफा हुआ. मैं इस घटना का खुद एक प्रत्यक्षदर्शीहूँ.

विधान सभा चुनाव के दौरान हरियाणा में नामांकन पत्र भरे जाने के समय कांग्रेसी विधायक लबीर पाल शाह के समर्थकों ने सुबह से ही पानीपत में जी टीरोड पर ऐसा जाम लगाया था कि शहर थम सा गया था. स्कूली बच्चे समय से स्कूल नहीं पहुँच पाए, लोग अपने ऑफिस नहीं जा सके. मरीज अम्बुलेंस और गाड़ियों में फंसे तड़पते रहे. पर सत्ता के प्यासे इन राजनेताओं की मस्ती जारी रही.

हाजीपुर में तो सारी हदें पार हो गयीं. जब नेताओं की गाड़ी जाम में फंस गयी तो उनके अंगरक्षकों ने जाम में फंसे लोगों को पीटना शुरू कर दिया. भाई इसमें लोगों की क्या गलती है, यदि प्रशासन ट्रैफिक जाम की समस्या को हल करने के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठा रहा है तो. जाम में अगर आम जनता फंसती है तो नेताओं के भी फंसने पर यह मरना-पीटना क्यों? जब आम जनता जाम में ठहर सकती है तो नेता क्यों नहीं? जनता जनार्दन है. नेता तो उनके सेवक हैं.

हो सकता है कि चंडीगढ़ में घटी घटना के लिए प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को सीधे तौर पर जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता. पर कहीं कहीं वे भी इसका हिस्सा बन गए हैं. मानवाधिकार आयोग की अध्यक्षा गिरिजा व्यास चाहें तो प्रधानमंत्री कार्यालय से पीडितों को मुआवजा देने की मांग कर कती है. पर क्या मुआवजा देकर ही उठती आवाज़ को दबा देना इस समस्या का हल है?

इन नेताओं और अति महत्वपूर्ण व्यक्तियों का क्या है? ये तो हर जगह समय पर हुँचने के लिए रास्ता जाम करवा देते हैं. पर क्या उन्होंने कभी सोचा है कि उनका यह कदम शायद किसी को समय से पहले ही ऊपर पहुंचा दे. सही बात है, इन्हें क्या मतलब? कीडे-मकोडे ही तो मर रहे हैं. कभी बम धमाकों में, कभी ट्रेन दुर्घटना में, कभी बाढ़ में, कभी सूखे में और हाँ अब जाम में भी. पर संवेदनहीन हो चुके इन मुर्दों की सुरक्षा तो ज्यादा जरुरी है ?

संपर्क: shaileshfeatures@gmail.com

4 टिप्‍पणियां:

സലാഹ് ने कहा…

Could you please translate it to english, then i may be able to publish it in our emadhyamam.com pilot issue launching on Mid of this month.I hope you can send something valuable to us regularly.

Aadi ने कहा…

See the monopoly of the democracy of this country; it is worse than the monarchy/dictatorship.

बेनामी ने कहा…

This article has made me really think about the current situation in India. Its true, although PM Manmohan Singh has apologized for the victim's family, the loss is irreparable. The government can't take common man just for granted or like use and throw. Traffic Jam is yet another problem that each person in India is suffering with every day. The Centre should find a solution asap so that these incidents doesn't happen again.

HARSHAD KULKARNI ने कहा…

You point and description is right but for this as a citizen of our nation, we need to think and should obey rules. We can to just continue keeping blaim on government. We have to in roots of problems and get it cured.