गुरुवार, 5 नवंबर 2009

क्या यही भारत की राजधानी है?

शैलेश कुमार
नई दिल्ली

सपनों का शहर, देश की राजधानी दिल्ली. मेरी, आपकी, हम सब की दिल्ली. यूपी, पंजाब, राजस्थान, गुजरात, मध्य प्रदेश, तमिलनाडु, पश्चिम बंगाल, देश का कोई राज्य, कोई जिला, शायद ही ऐसा हो जहाँ से आकर लोग दिल्ली में न बसे हों. मुझे ही देखिये, बेंगलुरु को छोड़कर कुछ महीनोंपहले दिल्ली आ गया. ये सोचकर कि ये भारत की राजधानी है. बहुत ज्यादा उन्नत है. सभी को अपना बना लेता है ये. पर दो महीनों के अनुभव ने एकदम से विचारधारा ही बदल कर रख दी.

यदि आपको याद हो तो कुछ दिनों पहले स्विस बैंकिंग समूह यूबीएस ने अपनी सर्वे रिपोर्ट में कहा था कि भारत में रहने और खाने के खर्च में लगातार इजाफा होने के बावजूद दिल्ली और मुंबई दुनिया से सबसे सस्ते शहरों की कतार में बने हुए हैं. पर ऐसा नहीं है. महंगाई ने दिल्ली की कमर तोड़ कर रख दी है. बसों के किराये अचानक ऐसे बढ़ें कि रोजाना सफ़र करने वाले यात्रियों के पैरों तले की जमीन ही खिसक गई.

बसों में अब दुगुना भाडा देकर लोगों को यात्रा करनी पड़ रही है. ऐसे में उन लोगों को तो करारा झटका लगा है जिनकी महंगाई बढ़ने के बाद भी तनख्वाह नहीं बढ़ी. दूध, अनाज, ऐसा कुछ भी नहीं बचा, जिसकी दाम न बढे हों. सबसे चौकाने वाली बात तो यह है कि इनके दामों में बेतहाशा वृद्धि हुई है.

खैर ये तो हुई महंगाई की बात. अब ज़रा दिल्ली के बसों पर एक नज़र डालिए. बस स्टाप पर मुझे बस में चढ़ने के लिए ज्यादा मशक्कत नहीं करनी पड़ती है. इसीलिए कि मेरे बिना हिले यात्रियों की भारी भीड़ धक्का दे अपने साथ मुझे भी बस के अन्दर पहुंचा देती है. और मज़े की बात तो यह है कि कभी-कभी मैं बस के अन्दर हवा में खड़े हो यात्रा करता हूँ. सच कह रहा हूँ भाई, ठसाठस भीड़ में मैं हवा में लटका रहता हूँ. मेरे पैरों के नीचे बस की सतह नहीं होती, न ही ऊपर लगे डंडे को पकड़ने की जगह. है न ये मजेदार सफ़र?

जब घंटों जाम लग जाता है तो बस में इस पोजीशन में हवा में लटके नानी याद आ जाती है. न तो साँस लेने की जगह, न ही शरीर को हिलाने की जगह. दिल्ली सरकार सालों से कहती आ रही है कि प्राइवेट ब्लू लाइन बसों को सड़कों से हटाकर डीटीसी बसें लाई जाएँगी. पर अपनी इस योजना पर दिल्ली सरकार ने कितना अमल किया है, यह किसी से भी छुपा नहीं है. जब तक दिल्ली में नहीं था, ब्लू लाइन बसों की करतूतों के बारे में केवल सुना करता था. पर अब प्रत्यक्ष अपनी आँखों से देख रहा हूँ. बस में यात्रियों को भेड़-बकरियों की तरह इनके चालक और कन्डक्टर समय, दूरी और सुरक्षा सभी को ताक पर रख देते हैं.

कुछ इलाकों को अगर छोड़ दें तो शहर के बाकी हिस्सों में अभी भी सड़कें टूटी-फूटी हैं. केवल फ्लाईओवर बना देने से शहर का विकास नहीं होता मुख्यमंत्री जी. जरा अंदरूनी इलाकों में जाकर देखिये. बड़े-बड़े नाले अभी भी खुले बह रहे हैं. साथ में बहा रहे हैं शहर भर का कूड़ा-करकट और गन्दा पानी. बीमारियाँ अलग फ़ैल रहीं हैं. पश्चिमी दिल्ली की हालत बद से भी बदतर कही जा सकती है. बारिश के समय सड़क और नालों में अंतर करना भी मुश्किल हो जाता है.

अभी तक शहर के ज्यादातर इलाकों में पीने योग्य पानी नहीं पहुँच पाया है. द्वारका सेक्टर एक और महावीर कालोनी में लोगों को अब तक समुद्र के जैसा खारा पानी ही मिल रहा है. बारिश होने पर स्थिति और भी बिगड़ जाती है.

अपराध का तो कहना ही क्या? क्राइम ग्राफ तो इस तेजी से ऊपर चढ़ रहा है, जैसे गर्मी से पारा चढ़ जाता है. लूट, हत्या और अपहरण तो जैसे आम बात हो गई है. अब तो पुलिस की वर्दी में भी वारदातों को अंजाम दिया जा रहा है. पुलिस स्टेशन से 200 मीटर के दायरे में लूटपाट हो जा रही है और पुलिस को कोई खबर नहीं है. कुछ दिनों पहले दिल्ली-गुडगाँव हाईवे के निकट एक लड़के की पुलिस वालों से सामने कुछ लोग धुनाई करते रहें, पर वे चुप्पी साधे उसका मज़ा लेते रहें.

कह रहे हैं आतंकवादियों के निशाने पर है दिल्ली. पर राजधानी की सुरक्षा व्यवस्था को देखकर अन्य प्रदेश की सुरक्षा व्यवस्था शर्मा जाये. कभी मौका मिले तो रेलवे स्टेशन जाइये. मेटल डिटेक्टर वाला एक दरवाजा लगाया गया है, पहाड़गंज की ओर से अन्दर जाने वालेरास्ते पर. लेकिन, लोग थोडी दूर पर एक बड़ी सी खुली जगह से भी बैठने के लिए बने चबूतरे को फान कर अन्दर जा रहे हैं. पर रेलवे सुरक्षा बल के जवानों को इसकी कोई खबर नहीं है.

ऐसी बात नहीं है कि दिल्ली कि इस हालत के लिए मैं केवल दिल्ली सरकार या प्रशासन को जिम्मेदार ठहरा रहा हूँ. जाहिर सी बात है कि इसके लिए आम जनता भी दोषी है. समस्या हर शहर में होती है. पर उस समस्या का समाधान उतना ही जल्दी होता है, जितनी जागरूक वहां की जनता होती है. दिल्ली एक प्रकार से पूरा भारत है. जो लोग यहाँ आकर बसे हैं, उनकी भी यह जिम्मेदारी बनती है कि वे दिल्ली को अपना मानकर, उसे साफ-सुथरा रखने में अपना योगदान दें. समस्याओं को प्रशासन तक पहुंचाए और जरुरत पड़ने पर अहिंसात्मक तरीकों का इस्तेमाल करते हुए सरकार के खिलाफ आवाज़ भी बुलंद करें.

नहीं तो यही एक सवाल कभी मैं, कभी आप और कभी कोई और उठाता रहेगा - क्या यही भारत की राजधानी है?

संपर्क: shaileshfeatures@gmail.com

3 टिप्‍पणियां:

गिरीन्द्र नाथ झा ने कहा…

दोस्त, अभी एक डॉयलॉग याद आता है, जिसे किसी भी शहर से जोड़कर आप बोल सकते है- ये दिल्ली है मेरी जान..। लेकिन आपने कुछ प्रमुख चिंताओं पर रोशनी डाली है। सबसे बड़ी समस्या महंगाई है..लोग टूट रहे हैं। मुझे डर लग रहा है कि कई माइग्रेशन का फ्लो उल्टा न हो जाए। लोग इस शहर से लौटने न लगें..यदि ऐसा होता है तो दिल्ली के लिए अच्छा नहीं होगा..

Shailesh Kumar ने कहा…

गिरीन्द्र नाथ जी. आपकी चिंता वाजिब है. कुछ ऐसे ही संकेत मिल रहे हैं. कुछ दिनों पहले मैंने कहीं पढ़ा भी है कि दिल्ली और मुंबई जैसे महानगरों की ओर रूख करने की अपेक्षा लोग अब कुछ छोटे नगरों की तरफ भी मुड़ने लगे हैं. और हाँ इसकी प्रमुख वजहों में महंगाई सबसे अव्वल नंबर है... बस हम यही मनाएं कि ऐसा कुछ नाहो.

बेनामी ने कहा…

ye dilli bina darwaze ki dharmashala hai. lakhon log roz aate hain. lakhon har sall aa kar bas jate hai. tabhi to samsyaon ka ambar hai. sat pal